रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रावण की जगह सीता को क्यों ले आए?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रायसेन में ‘रामचरित मानस’ के प्रसिद्ध हनुमान–रावण संवाद को सीता–हनुमान संवाद के रूप में प्रस्तुत किया. यह तथ्यात्मक ग़लती विपक्षी नेताओं से होती तो हंगामा मचता, लेकिन यहां सन्नाटा रहा. यह घटना धार्मिक आख्यानों के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाती है.

शिबू सोरेन: जंगल के उजाले से बियाबान लोकतंत्र की मुंडेरों तक

शिबू सोरेन की कहानी किसी काल्पनिक नायक की नहीं है. यह उस भारत का पीड़ाकाव्य है, जिसे अक्सर मुख्यधारा की राजनीति और मीडिया ने अनदेखा किया. एक ऐसा भारत जो जंगलों में सांस लेता है, जो ज़मीन से जुड़ा है और जो बार-बार यह सवाल उठाता है कि 'विकास' किसका होता है.

उपराष्ट्रपति का इस्तीफ़ा लोकतंत्र पर धब्बा, लेकिन अब राजस्थान की राजनीति क्या करवट लेगी?

जगदीप धनखड़ राजस्थानी किसान हैं, जो कई बार ज़मीन और फ़सल की हिफ़ाज़त के लिए झुक जाता है. लेकिन जब उसे लगता है कि पानी सिर से गुज़र रहा है तो वह पटखनी देने में देर नहीं लगाता. उसकी वह पटखनी किसी विद्रोही से भी अधिक ख़तरनाक़ होती है.

येनपक कथा और अन्य कहानियां: आत्मा, स्मृति और प्रतिरोध की स्त्री-कथा

पुस्तक समीक्षा: अनामिका अनु की कहानियां पाठक के भीतर अस्थायी पीड़ा को पिरो जाती हैं. आत्मा, स्मृति और प्रतिरोध की ये स्त्री-कथाएं सौंदर्यशास्त्रीय बोध की अनुपमा के साथ मौजूद हैं.

राजस्थान में सौर ऊर्जा संयंत्रों के शिकार: पशु, पक्षी और स्थानीय भूगोल

राजस्थान में आ रहे सौर ऊर्जा संयंत्रों के चलते प्राकृतिक वनस्पति नष्ट हो रही है, चारागाह खत्म हो रहे हैं और जैव विविधता पर गंभीर संकट आ रहा है. राजस्थान के गौरव कहे जाते खेजड़ी के वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटाई हो रही है.
रेगिस्तान पर मंडराते संकट पर हमारी रिपोर्ताज की यह दूसरी कड़ी.

रेगिस्तान में सौर ऊर्जा संयत्रों की बाढ़: राजस्थान की चारागाह भूमि पर संकट, निवासी आक्रोशित

पिछले वर्षों में राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों की बहुत सारी भूमि सौर ऊर्जा पैदा कर रही कंपनियों को आवंटित कर दी गई है. इससे स्थानीय लोगों में आक्रोश उमड़ रहा है, साथ ही कई तरह के सामाजिक संकट भी जन्म ले रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन द्वारा इस खास पड़ताल की पहली किस्त.

गगन गिल को अकादमी सम्मान: 70 साल में सिर्फ़ दो स्त्रियाँ कवि के तौर पर पुरस्कृत हो पायीं?

गगन गिल को मिला पुरस्कार हिंदी साहित्य के नेपथ्य में बजते उस पुरुष वर्चस्ववाद को भी एक चेतावनी है, जो आज तक न ब्राह्मणवाद से आगे निकल पाया है और न ही मनुवाद से. आज राजनीति में तो स्त्री अधिकारों का प्रश्न बहुत सशक्त ढंग से उठ रहा है, लेकिन साहित्य का संसार इससे अछूता है.

क्या भाजपा दीनदयाल उपाध्याय के रास्ते पर चल रही है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत के नारे लगाते हैं, अगर वे दीनदयाल उपाध्याय की ओर मुड़ें तो पता चलेगा कि भाजपा का आचरण उनके विचारों को नकार देता है.

क्या आज सिर्फ़ कृष्ण को ही याद करेंगे, कृष्णभक्त मुस्लिम कवियों को नहीं?

कृष्ण जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के साथ-साथ उन महान कवियों को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने कभी श्रीकृष्ण के प्रति भक्तिभाव से सुंदर काव्य रचे. यह दिन कवि तानसेन, ताज, रहीम, रसखान, जमाल, मुबारक, ताहिर अहमद, नेवाज, आलम, शेख तथा रसलीन का भी दिन है.

अरुणा रॉय: देवडूंगरी की दीपशिखा

इस देश के गांवों में बसने वाले लोगों को साथ लेकर बदलाव की मुहिम शुरू करना और एक बदलाव को सामने ला देना एक बड़ी बात है. अरुणा रॉय ने यह कर दिखाया है.

काठ की हांडियों पर टिकी भारतीय जम्हूरियत के लिए ब्रिटिश आम चुनाव के सबक

इंग्लैंड के नेता चुनाव हारने के सेवानिवृत्त हो जाते हैं, आख़िर भारतीय राजनीति कब बदलेगी कि जो हार जाए, वह विदा हो जाए और अपनी पार्टी के भीतर से नई प्रतिभाओं को मौका दे.

हितोपदेश के एक श्लोक से वस्त्र की तरह गिरी एक पंक्ति और डर कर जमी हुई कविता में प्रतिध्वनियां

अनामिका की एक सामान्य-सी कविता के एक संदर्भ को लेकर चल रही बहस के भीतर चिंगारियां या अदावत का आह्लाद तलाश करने के बजाय यह देखना ज़रूरी है कि हम शब्दों के प्रति कितने सचेतन हैं कि कविता के शब्द कभी हमारी स्मृतियों के भीतर भी कभी नहीं गिरें. भले ही वे नारायण पंडित के हितोपदेश के किसी श्लोक के शब्द हों या फिर अनामिका की किसी स्मृति के बिंब से जुड़े.

ऐरोन बुशनेल का आत्मदाह इज़रायली क्रूरता के प्रति अमेरिकी शासन के अंधे समर्थन का परिणाम है

अमेरिकी सैनिक ऐरोन बुशनेल ने वॉशिंगटन डीसी में इज़रायली दूतावास के सामने 'फ्री फ़िलिस्तीन' का नारा लगाते हुए ख़ुद को ज़िंदा जला लिया ताकि दुनिया की नज़रें गाजा की ओर मुड़ जाएं. क्या बुशनेल जैसे लोग भुला दिए जाएंगे? क्या कोई युद्ध के विरोध में प्रतिबद्धता दिखाएगा और गाजा से लेकर यूक्रेन तक मानवीय नरसंहार का विरोध करने के लिए खड़ा हाेगा?

चौधरी चरण सिंह: भारत रत्न और ख़िज़ां में बहार तलाशती सियासी अय्यारियों की जुगलबंदी

चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न का अलंकरण क़ाबिले-तारीफ़ है; लेकिन अगर उनके विचारों की लय पर सरकार अपने कदम उठाती तो बेहतर होता. सरकार से ज़्यादा यह दारोमदार रालोद के युवा नेता पर है कि वह अपने पुरखे और भारतीय सियासत के एक रोशनख़याल नेता के आदर्शों को लेकर कितना गंभीर है.

राजस्थान का सुरेंद्र पाल सिंह टीटी प्रकरण 76 साल पहले संविधान सभा में उठे सवाल याद दिलाता है

राजस्थान विधानसभा की श्रीकरणपुर सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने अपने उम्मीदवार को जीत से पहले मंत्री बना दिया था. बाद में उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी ने हरा दिया. 1948 में संविधान सभा में सवाल उठा था कि क्या विधायकों, सांसदों को मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद फिर निर्वाचन प्रक्रिया से गुज़रना चाहिए.