बीते सप्ताह दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक हेड कॉन्स्टेबल ने कथित तौर पर बिहारी पहचान को लेकर एक 22 वर्षीय डिलीवरी बॉय पांडव कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी. बीते कुछ बरसों में भारत में धर्म और जाति के आधार पर हो रही हिंसा सामान्य हो चली है. इसमें क्षेत्रीय भेदभाव आधारित हिंसा की ख़बरें भी आती रही हैं, हालांकि बिहारी प्रवासी इस हिंसा के निशाने पर दशकों से रहे हैं.
घटना बरेली ज़िले की है, जहां आलमपुर जाफराबाद ब्लॉक की सरदार नगर ग्राम पंचायत में जल जीवन मिशन के तहत डेढ़ साल पहले बनी ओवरहेड पानी की टंकी गिरने से सात लोग घायल हो गए, जिनमें एक की हालत गंभीर बताई जा रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि यह टैंक ख़राब सामग्री का इस्तेमाल कर बनाया गया था.
बीते कुछ समय में ओडिशा हाईकोर्ट समेत राज्य की कुछ अदालतों ने आदिवासी और दलित समुदायों के लोगों को ज़मानत की शर्त के बतौर पुलिस थानों की सफाई करने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने इन शर्तों की प्रकृति को क्रूर और निंदनीय बताते हुए कहा कि ऐसे आदेश मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं. साथ ही यह प्रवृत्ति हाशिये पर पड़े समुदायों के ख़िलाफ़ न्यायपालिका में मौजूद जातिगत पक्षपात को उजागर करती है.
आजकल हमारे समाज में क्षणिक पागलपन- किसी मामूली बात पर चाकू घोंप देना, गोली चला देने जैसी अभागी घटनाओं की बारंबारता इतनी बढ़ गई है कि अख़बारों में इन्हें सरसरी तौर पर पढ़कर परे सरका दिया जाता है. दूसरा सवाल यह कि अगर यह पागलपन है तो हमेशा कमज़ोरों के विरुद्ध ही क्यों अभिव्यक्त होता है?
मज़दूरों के पास निश्चित काम के घंटे, छुट्टियां, या सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) की कमी है. अधिकांश असंगठित मज़दूरों की आय बहुत कम है. नौकरी की असुरक्षा और जोखिम भरे माहौल में काम करने को मजबूर मज़दूर अक्सर भुखमरी या गरीबी के कगार पर रहते हैं. विकास कार्यों में अहम भूमिका निभाने के बावजूद, उन्हें उन सुख-सुविधाओं से दूर रखा जाता है, जो वे ख़ुद बनाते हैं.
ग्रामीण भारत की महिलाएं मनरेगा के तहत काम करते हुए अपने हक़ की मज़दूरी के लिए संगठित संघर्ष कर रही हैं. लेकिन अब उनकी लड़ाई सिर्फ सिस्टम से नहीं, बल्कि तकनीक से भी है. एनएमएमएस ऐप जैसी तकनीकी बाधाएं उनके काम, हाजिरी और मज़दूरी, तीनों को अनिश्चित बना रहे हैं.
सफलता के इस नशे, जो अपने चरम पर है, में कुछ माओवादियों और ज़्यादातर पुलिस बलों के द्वारा पिछले बीस सालों में की गई हज़ारों हत्याओं के लिए किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है. सलवा जुडूम के कारण औरतों का बलात्कार हुआ, सौ से भी ज़्यादा गांवों को आग लगा दिया गया और बस्तर में हज़ारों की संख्या में लोग विस्थापित हुए. लेकिन 'सफलता' के शोर में इन घटनाओं पर उठाए गए सवाल अनसुने कर दिए जा
अदालत ने एक पिता द्वारा उनकी बालिग बेटी के 'अपहरण' और विवाह के लिए मजबूर करने संबंधी एफआईआर रद्द करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा. कोर्ट ने पुलिस द्वारा सहमति से हुए विवाहों को लेकर एफआईआर दर्ज कर 'चिंताजनक प्रवृत्ति' पर डीजीपी को सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.
हम जितनी चर्चा नेताओं के भ्रष्टाचार की करते हैं, सिविल सेवकों के भ्रष्टाचार की नहीं करते, जबकि जहां तक सरकारी योजनाओं में आर्थिक भ्रष्टाचार की बात है, नेता उसे तब तक अंजाम नहीं दे सकते, जब तक उसमें किसी सिविल सेवक को न शामिल करें. सिविल सेवकों के काम की जगहें अभी भी उनके रौब-दाब और अधिकारों के दुरुपयोग की जगहें ही बनी हुई हैं.
नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन को लेकर वकीलों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने यूपी पुलिस पर दमन, अवैध हिरासत और ‘दुष्प्रचार’ के आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि मजदूरों के वैध आंदोलन को ‘साजिश’ बताकर बदनाम किया जा रहा है, जबकि पुलिस की कार्रवाई कानून और प्रक्रिया के खिलाफ है.
संभल ज़िला प्रशासन ने ज़िले के बिछौली गांव में एक इमामबाड़े और ईदगाह को यह दावा करते हुए ध्वस्त कर दिया कि ये इमारतें सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बनाई गई थीं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी की आदित्यनाथ सरकार में धर्मांतरण विरोधी क़ानून के तहत 'झूठी, फ़र्ज़ी और निराधार एफआईआर' दर्ज किए जाने को गंभीर चिंताजनक चलन बताया है. अदालत ने इस बात का ज़िक्र किया कि इस क़ानून के तहत पुलिस और तीसरे पक्षों द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.
देश में प्राइवेट सेक्टर की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (टीसीएस) की नासिक ब्रांच में महिला कर्मचारियों द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद आईटी क्षेत्र के कर्मचारियों के संगठन नैसेंट इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एम्प्लॉइज़ सीनेट ने श्रम और रोज़गार मंत्रालय से टीसीएस में पॉश अनुपालन का विस्तृत ऑडिट करने की मांग की है.
उत्तम नगर: तरुण हत्या मामले में आरोपी के घर पर बुलडोजर की कार्रवाई को हाईकोर्ट ने 10 दिन के लिए रोका
उत्तम नगर में तरुण हत्या मामले के एक आरोपी के निर्माणाधीन मकान के हिस्से को एमसीडी ने ध्वस्त किया, हालांकि एजेंसियों ने इसे मामले से असंबंधित बताया. इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति पर 10 दिनों तक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए परिवार को अपील का मौका दिया है.
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में खाप और स्वयंभू जाति पंचायतों द्वारा कथित तौर पर किए जा रहे सामाजिक बहिष्कार, दबाव और धमकी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इनके कामकाज पर अंकुश लगाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए, जिसमें कहा गया है कि ऐसे निकाय व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वायत्तता में हस्तक्षेप नहीं कर सकते.