सत्यम वर्मा और आकृति के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून इस्तेमाल करके सरकार ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि भारत में बंधुत्व संगीन अपराध है; बल्कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है.
सत्यम वर्मा और आकृति के साथ सृष्टि, रूपेश, आदित्य आनंद, मनीषा और हिमांशु ठाकुर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने नोएडा के मज़दूरों की हड़ताल और विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ़्तार किया था. उन पर आरोप है कि उन्होंने नोएडा के मज़दूरों को हड़ताल और हिंसा के लिए उकसाने की साज़िश की थी. पुलिस ने यह भी खोज निकाला है कि उनका रिश्ता पाकिस्तान से है. ख़तरनाक नक्सलवादी तो वे हैं ही.
सत्यम वर्मा को लिखने पढ़ने वाले अच्छी तरह जानते हैं. वे पत्रकार, अनुवादक और लेखक हैं. इन गिरफ़्तार लोगों में सबसे बड़ी उम्र के हैं. शेष प्रायः युवा हैं. रूपेश ऑटो रिक्शा चलाते हैं, आदित्य आंनद सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं, हिमांशु विद्यार्थी हैं, मनीषा मज़दूर हैं. आकृति रंगकर्मी हैं और सृष्टि कलाकार हैं.
अपने काम से काम रखने का मंत्र जपते हुए जीवन गुज़ारने वाले कह सकते हैं कि इन सबका नोएडा के मज़दूरों से क्या लेना देना? अगर ये नोएडा के मज़दूरों के आंदोलन में शामिल हुए, तो ज़रूर इनका कोई और इरादा रहा होगा. इनका अपना कोई मक़सद होगा: जैसे पाकिस्तान के इशारे पर देश में अशांति और अस्थिरता फैलाना या भारत में माओवादी क्रांति लाना.
इसके अलावा एक और बात ध्यान देने की है. भारतीय राज्य हमें यह समझाना चाहता है कि मज़दूरों को अपनी कोई अक्ल नहीं है. उन्हें सत्यम वर्मा या आकृति या आदित्य जैसे सुशिक्षित षड्यंत्रकारी उनकी अपनी हालत के बारे में असंतोष पैदा करके गुमराह करते हैं. उन्हें विरोध और विद्रोह के लिए उकसाते हैं. अगर सत्यम या आकृति जैसे लोग न होते तो नोएडा में मज़दूर आंदोलन नहीं करते, हिंसा न होती और सुख चैन बना रहता.
यही तर्क दिल्ली पुलिस ने नागरिकता के क़ानून में संशोधन वाले क़ानून के बाद दिया था. उसने उमर ख़ालिद, शरजील इमाम जैसे लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने भोले-भाले मुसलमानों में इस क़ानून को लेकर ग़लतफ़हमी पैदा की. पुलिस के मुताबिक़, मुसलमानों को इस क़ानून से कोई दिक़्क़त न थी. वह तो शरजील और उमर जैसे पढ़े-लिखे शातिर दिमाग़ थे जिन्होंने मुसलमानों में दुष्प्रचार किया और उन्हें आंदोलन करने के लिए उकसाया. उसी वजह से हिंसा हुई. इन साज़िश करने वालों को निष्क्रिय करना ज़रूरी हो जाता है जिससे राष्ट्र में शांति बनी रहे. 6 साल से ये ‘ख़तरनाक दिमाग़’ जेल में बंद हैं.
मज़दूरों का अस्तित्व
हम सत्यम वर्मा, सृष्टि या आकृति के बारे में बात करें, उसके पहले मज़दूरों की बात कर लें. आख़िरकार असल मसला तो उनका आंदोलन है जिसका समर्थन ये लेखक, विद्यार्थी या कलाकार कर रहे थे. ये मज़दूर हमें तभी दिखलाई देते हैं जब ये कारख़ानों से निकलकर सड़क पर आते हैं. वरना हम उन्हें खाते, पीते, पहनते रहते हैं, उन पर चलते हैं, उनमें रहते हैं लेकिन उनके वजूद का हमें अहसास नहीं होता.
कार्ल मार्क्स ने 1844 की अपनी पांडुलिपि में लिखा था कि मज़दूरों का पूरा अस्तित्व उन वस्तुओं में लुप्त हो जाता है जो उनके श्रम से तैयार की जाती हैं. आख़िरकार एक श्रमिक है ही क्या उसके अपने श्रम के अलावा? वह सड़क जिस पर हम चलते हैं, वह कार या बस जिनके सहारे हम दूरियां तय करते हैं, वे मकान जो हमें गर्मी और ठंड से राहत देते हां, उन सबमें तो ये श्रमिक ही न्यस्त हैं. लेकिन हम कभी इन्हें नहीं देखते.
वे तभी दिखते हैं जब वे सिर्फ़ यह कहने के लिए अपनी काम की जगहों से बाहर निकलते हैं कि उनका वह ढांचा भी अब नहीं चल सकता जिसमें से वह श्रम निकलता है.
मुझे याद है 2020 की गर्मियों के वे दिन जब दिल्ली की सड़कें मज़दूरों से भर गई थीं. सारे ‘संभ्रांत’ लोग कोरोना से बचने को अपने- अपने घरों में क़ैद हो गए थे. सारी कारें अपनी पार्किंग में थीं. लेकिन सड़कों पर मज़दूर ही मज़दूर चल रहे थे. याद है कि एक विद्यार्थी ताज्जुब से कहा था कि इतने साल दिल्ली में रहते हुए उसे मालूम न था कि इस शहर में इतने मजदूर रहते हैं. वे अब तक उसे दिखलाई क्यों न दिए थे?
उसी तरह अप्रैल के महीने में नोएडा और दिल्ली के लोगों को मालूम हुआ कि उनके इर्द गिर्द मज़दूर रहते हैं. अप्रैल के महीने में नोएडा के कई कारख़ानों के मज़दूर सड़क पर उतर आए. वे अपनी तनख़्वाह में बढ़ोत्तरी की मांग कर रहे थे. आंदोलन के पहले तक उनका मासिक वेतन अधिकतम 11, 000 रुपये था. इस दयनीय तनख़्वाह में कोई घर कैसे चलेगा?

ईरान पर इस्राइल और अमरीका के हमले के बाद महंगाई आसमान छूने लगी, रसोई की गैस मिलना बंद हो गई या ‘काला बाज़ार’ में कई गुना अधिक क़ीमत देकर ही मिल सकती थी. मज़दूर पहले ही मानवीय जीवन के न्यूनतम स्तर पर रह रहे थे. अब वे खाई में गिरा दिए थे. वे इतना ही वेतन मांग रहे थे जिसमें उनके यहां दो वक्त चूल्हा जल सके और उनके बच्चे स्कूल जा सकें. अपनी हालत जानने के लिए उन्हें किसी बुद्धिजीवी की ज़रूरत न थी. उनकी जीवन स्थिति ही उनकी शिक्षक थी.
सिर्फ़ नोएडा के मज़दूर सड़क पर नहीं थे. मानेसर, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, छत्तीसगढ़, गुजरात और तमिलनाडु तक में मज़दूर बेचैन होकर अपनी खोलियों से बाहर आ गए. क्या वे ग़ैर वाजिब मांग कर रहे थे?
कौन सुनेगा श्रमिकों के दुख?
मज़दूरों को यह मांग करनी ही क्यों पड़ी? क्यों उद्योगपतियों और सरकारों को न सूझा कि 11000 रुपये में एक परिवार का ज़िंदा रहना नामुमकिन है? क्यों यह बात नारों की शक्ल में मज़दूरों को कहानी पड़ी जिससे भले कान दुखने लगे?
क्या इन मज़दूरों को उनके इस संघर्ष में अकेला छोड़ देना चाहिए था? क्या उनकी आवाज़ों में दूसरी आवाज़ें नहीं मिलनी चाहिए थीं?
आकृति, सृष्टि, आदित्य, रूपेश, सत्यम ख़ुद मज़दूर नहीं. लेकिन वे भारतीय संविधान की प्रस्तावना वाले भारत के लोग हैं.
भारत में अगर किसी तबके को आज़ादी, बराबरी और इंसाफ़ में कमी का अहसास हो और यह अहसास दूसरों को भी होना चाहिए. अपने लिए आज़ादी, बराबरी और इंसाफ़ हासिल करने के लिए अगर वे आवाज़ उठाएं तो बाक़ी लोगों के कान ऐसे हों कि उनकी आवाज़ सुन सकें. सिर्फ़ सुनें नहीं, उनकी आवाज़ में अपनी आवाज़ भी मिलाएं. इसी तरह वे भारतीय सामूहिकता का निर्माण कर सकेंगे. इसी संवैधानिक संवेदना और सहानुभूति के ज़रिए भारतीयता का निर्माण होता है.
लेकिन आज का भारत का राज्य यह नहीं मानता. वह मानता है कि राष्ट्र अलग-अलग स्वार्थों के गुटों से मिलकर बनता है. एक के हित से दूसरे को क्या मतलब? इसलिए अगर आप अपने पेशे, धर्म, जाति से परे किसी से सहानुभूति रखते हैं और उसके साथ खड़े होते हैं तो भारतीय राज्य आपको शक की निगाह से देखता है.
सरकार को एकजुटता में दिखती ‘साज़िशें’
विद्यार्थी आख़िर किसान के दुख से दुखी क्यों है, हिंदू क्यों मुसलमान पर हो रहे ज़ुल्म से क्षुब्ध है, मध्यवर्गीय व्यक्ति मज़दूरों के आंदोलन में क्यों शामिल हैं? सिख क्यों शाहीन बाग आंदोलन में लंगर चला रहे थे? क्यों लेखकों या कलाकारों ने मोहम्मद अखलाक़ की हत्या के बाद अपना विरोध ज़ाहिर किया? क्यों कर्नाटक में रहनेवाली दिशा रवि पंजाब और हरियाणा के किसानों के आंदोलन के पक्ष में लिख बोल रही थी? क्यों दूसरे देश की कलाकार रिहाना या सामाजिक कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग भारत के किसानों के लिए आवाज़ उठा रहे थे? ज़रूर इन सबके पीछे कोई साज़िश होगी.
इस तरह जो एकजुटता या बंधुत्व सृजित होता है वह अपराध है. इस तरह निर्मित होने वाली भारतीयता का निर्माण आज की सरकार को नापसंद है.
हां! आज का भारतीय राज्य सिर्फ़ एक तरह की एकता चाहता है. वह एकता किसी सहानुभूति पर नहीं, घृणा पर टिकी एकजुटता है. वह हिंदू किसानों, मज़दूरों, उद्योगपतियों, नौकरीपेशा लोगों को मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ घृणा की गोंद से जोड़कर हिंदू एकता गढ़ना चाहती है.
सत्यम वर्मा, आकृति या सृष्टि लेखक, कलाकार हैं. वे घृणा नहीं, बंधुभाव के ज़रिए मानवीय एकजुटता निर्मित करना चाहते है. उनका प्रश्न एक है: क्या हम अपनी भाषा, धर्म, पेशे और वर्ग, राष्ट्रीयता का अतिक्रमण करके एक मानवीयता का निर्माण कर सकते हैं?
क्या हम सब पहले की तरह ही कला प्रदर्शनियों में जाकर कलाकृतियों की सराहना कर सकते हैं जब सृष्टि, आकृति जेल में हैं?
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
