‘ऑनर किलिंग’ का क़हर: औरतों की मर्ज़ी को घर की इज़्ज़त के नाम पर क़ुर्बान करना

एक औरत अपने परिवार और समाज की महज़ एक जायदाद है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं है- एक ऐसी 'ट्रॉफ़ी' जो उनकी इज़्ज़त की निशानी है. इस 'इज़्ज़त' की हिफ़ाज़त के नाम पर उसकी अपनी इच्छाओं, उसकी अपनी पसंद और उसकी अपनी ख़ुशियों की बलि चढ़ाई जा सकती है. और, कभी-कभी तो उसकी जान की भी.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

(यह लेख ‘लव जिहाद’ के नाम पर हो रही ज़्यादतियों को दर्ज करने वाले चार लेखों की श्रृंखला का अंतिम भाग है. पहला , दूसरा और तीसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं.)

यह सोच कि औरतें अपने परिवार और समाज की इज़्ज़त की प्रतीक होती हैं, कि मर्दों का औरतों के शरीर और उनकी पसंद पर पूरा हक़ होता है, और यह कि ‘बाहरी’ मर्द ख़तरनाक यौन शिकारी होते हैं, इस तरह की सोच में छिपी औरत-विरोधी भावना का सबसे क्रूर रूप ‘ऑनर किलिंग’ (इज़्ज़त के नाम पर हत्या) में दिखता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ने ऑनर किलिंग को किसी रिश्तेदार- ख़ास तौर पर किसी औरत की हत्या के तौर पर परिभाषित किया है, जिसके बारे में यह माना जाता है कि उसने परिवार की बदनामी की है. अगर कोई औरत अपनी जाति या धर्म से बाहर के किसी मर्द से प्यार करती है और उससे शादी करने का फ़ैसला करती है, तो उसके परिवार के मर्द, आमतौर पर उसके भाई और पिता, उसकी और अक्सर उसके साथी की भी हत्या कर देते हैं.

इस तरह की हत्याओं की संख्या का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. भारत में सरकारी संस्थाएं ‘ऑनर किलिंग’ के आंकड़े तो जारी करती हैं, लेकिन ये आंकड़े भरोसेमंद नहीं लगते, क्योंकि पूरे देश में एक साल में ऐसे मामलों की संख्या शायद ही कभी दो अंकों से ज़्यादा होती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, तथाकथित ऑनर किलिंग के मामले कुछ ही राज्यों में ज़्यादा देखने को मिलते हैं- झारखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक.

मैंने 2025 के दौरान हुई ‘ऑनर किलिंग’ (इज़्ज़त के नाम पर हत्या) की घटनाओं की ऑनलाइन रिपोर्ट खोजीं. जिन घटनाओं का पता चला उनमें से कुछ का उल्लेख कर रहा हूं.

  • अप्रैल में गुजरात के अमरेली ज़िले में एक मुस्लिम किसान ने तकिये से मुंह दबाकर अपनी बेटी की हत्या कर दी, क्योंकि वह एक हिंदू लड़के से प्यार करती थी.
  • उत्तर प्रदेश के हरदोई में एक ब्राह्मण महिला ने अपनी जाति से बाहर शादी कर ली इसके बाद उसके शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे भाई ने देसी पिस्तौल से उसकी बाईं कनपटी पर गोली मार दी, ताकि यह आत्महत्या लगे.
  • झारखंड के दुमका में एक 17 साल की लड़की के पिता ने लड़की के दो चचेरे भाइयों की मदद से उसका गला काट दिया, क्योंकि उस लड़की को दूसरी जाति के एक लड़के से प्यार हो गया था, और उसने अपनी बांह पर उसका नाम भी गुदवा लिया था.
  • हरियाणा के रोहतक ज़िले के एक गांव में एक आदमी ने अपनी 23 साल की बहन की गोली मारकर हत्या कर दी, क्योंकि उसने अपने परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक ऑटो रिक्शा चालक से शादी कर ली जो उनकी जाति का नहीं था. भाई के दोस्तों ने उसकी मदद की, और उन्होंने उसके छोटे जीजा को भी घायल कर दिया, जो गोली लगने के बाद भी बच गया.
  • कर्नाटक के धारवाड़ में छह महीने की गर्भवती महिला को उसके पिता और अन्य रिश्तेदारों ने पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उसने अंतरजातीय शादी की थी.
  • तेलंगाना के करीमनगर में एक और 17 साल की लड़की को उसके पिता ने पहले कीटनाशक पिलाकर और फिर गला घोंटकर मार डाला, क्योंकि उसने दूसरी जाति के एक युवक के साथ रिश्ता ख़त्म करने से मना कर दिया था.
  • महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक और भयानक हत्या हुई. एक कथित ऊंची जाति की युवती को एक नव-बौद्ध दलित युवक, सक्षम ताते, से प्यार हो गया था. वे तीन साल तक साथ रहे. एक दिन लड़की के भाई ने सक्षम को पीटा, उसे गोली मारी और फिर टाइल से उसका सिर कुचल दिया. सोशल मीडिया पर उस दुखी युवती का वीडियो सामने आया, जिसमें वह अपने प्रेमी के अंतिम संस्कार के दौरान उसके शव के साथ ‘शादी’ कर रही थी.
(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया, जिसमें अपनी मर्ज़ी से वयस्कों के शादी करने के अधिकार को सही ठहराया गया. कोर्ट ने कहा कि ‘एक वयस्क महिला अपनी मर्ज़ी से किसी से भी शादी करने के लिए आज़ाद है, और परिवार ऐसे फ़ैसलों में दख़ल नहीं दे सकते.’

देश की सबसे बड़ी अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे उन जोड़ों की रक्षा करें जिन्हें रिश्तेदारों से धमकियां मिल रही हैं, और कोर्ट ने सामाजिक तथा पारिवारिक दबाव के असली ख़तरे को पहचाना.

ऐसे बहुत कम मामले हैं, मगर जब राज्य और अदालतें अलग-अलग धर्मों के जोड़ों की रक्षा के लिए असरदार तरीक़े से बीच-बचाव करती हैं, तो जान तो बच जाती है, लेकिन इसकी बहुत बड़ी मानवीय क़ीमत चुकानी पड़ती है. लता सिंह, जो उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद ज़िले में एक राजपूत परिवार में पैदा हुई लता सिंह को 2000 के दशक की शुरुआत में एक बनिया परिवार के लड़के से प्यार हो गया और उन्होंने उससे शादी कर ली. उनके भाइयों ने उन्हें, उनके पति को और उनके पूरे परिवार को जान से मारने की धमकियां दीं.

लता सिंह के पति, उनके पति के 6 भाई, 2 बहनें, मां और पिता, अपनी जान जाने के डर से एक ही रात में अपना गांव, घर, ज़मीन और जायदाद छोड़कर उनके साथ निकल गए. उनके भाइयों ने एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उनके पति और उनके परिवार पर अपहरण और बलात्कार का आरोप लगाया गया. लता सिंह के पति की बहनों और उनके पतियों को छह महीने के लिए जेल भेज दिया गया. इन सब परेशानियों के दौरान भी वह छिपी रहीं.

यह आपराधिक मामला चार साल तक चला. कई बार ऐसा भी हुआ जब उनके भाइयों ने उनका पीछा किया और वह बाल-बाल बचीं. वह एक दिन बुर्क़ा पहनकर अदालत गईं, जिस दिन उनके भाइयों को उनके आने की उम्मीद नहीं थी. जब उन्होंने आख़िरकार गवाही दी कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से अपने पति और उनके परिवार के साथ रहने का फ़ैसला किया है, तो उनके भाइयों ने दावा किया कि वह मानसिक रूप से बीमार हैं. जयपुर के साइकियाट्रिक सेंटर में एक जांच समिति ने कई बार उनकी जांच-पड़ताल की, इसके बाद उन्हें मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर दिया गया.

उनकी ज़िंदगी में बदलाव तब आया, जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस जेएस वर्मा ने उनके अधिकारों की रक्षा के लिए दख़ल दिया. सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका के बाद कोर्ट ने वयस्क महिलाओं के अपनी मर्ज़ी से शादी करने के अधिकार को मान्यता दी. इसके बाद ही, सालों तक चली हिंसा, जबरन विस्थापन, झूठे आपराधिक आरोप, धमकियों और क़ानूनी लड़ाई का दर्दनाक दौर आख़िरकार ख़त्म हुआ. उन्होंने अपने जैसे उन लोगों के लिए एक सहायता समूह बनाया, जिन्होंने अपने धर्म और जाति से बाहर शादी करने का फ़ैसला किया था.

लता सिंह ने फ़्रंटलाइन के साथ बातचीत की. बातचीत को दौरान बहुत ही भावुक होकर याद करती हैं कि उनके भाई उन्हें कितना प्यार करते थे. इसी वजह से सालों तक उनके भाइयों द्वारा दी गई धमकियां और उत्पीड़न उनके लिए और भी ज़्यादा तकलीफ़देह थी. उनके भाई-बहन अब भी उनसे नाराज़ हैं. उन्हें अपने पैतृक घर में घुसने की इजाज़त नहीं है.

लेकिन इन सबके बावजूद वह पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं, ‘मैं अपनी ज़िंदगी से ख़ुश हूं. हर रोज़, पुलिस थानों में बैठे हुए, मैं ऐसे कई मामले देखती हूं जहां लड़कियां अपने परिवार की मर्ज़ी से शादी करती हैं और फिर मारपीट की शिकार होकर, दहेज के लिए जलाए जाने के बाद, या फिर अधमरी हालत में वापस लौटती हैं. मैं बार-बार देखती हूं कि तथाकथित ‘इज़्ज़तदार’ अरेंज्ड मैरिज क्या-क्या अंजाम हो सकते हैं. ऐसे में अगर कोई लड़की अपना जीवनसाथी ख़ुद चुनती है, तो उसे किसी अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि मैं उस घर का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा सकती, जहां मैंने अपना पूरा बचपन बिताया है? यही आज की हक़ीक़त है. और ज़िंदगी तो चलती ही रहती है.’

वह कहती हैं, ‘ऑनर क्राइम (इज़्ज़त के नाम पर होने वाले अपराध) का लगातार होना यह दिखाता है कि अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को आज भी एक सामाजिक रियायत माना जाता है, न कि एक ऐसा संवैधानिक अधिकार जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता… न तो समाज द्वारा और न ही कई विभागों द्वारा. इसके बजाय, जोड़े को यह महसूस कराया जाता है कि उन्होंने कोई ग़लती की है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

भावनात्मक ब्लैकमेल, असहनीय दबाव

उनसे कहा जाता है कि वे अपने माता-पिता के पास लौट जाएं: ‘उन्होंने ही तुम्हें पाला-पोसा है, वे तुमसे प्यार करते हैं, वे कभी भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुंचाना चाहेंगे. उन पर लगातार भावनात्मक दबाव डाला जाता है. उनसे पूछा जाता है, ‘क्या तुम्हें अपने पिता को रोते हुए देखना अच्छा लगता है?’

मुझे एक ऐसा मामला याद है जिसमें पिता ने कहा था कि वह शादी को स्वीकार करते हैं और बस थोड़ा भरोसा चाहते हैं. उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को पुलिस स्टेशन लाया जाए ताकि वह उसे दूर से देख सकें- बस यह जानने के लिए कि वह ज़िंदा है. हमें लगा कि यह एक उचित और मानवीय गुज़ारिश है. लेकिन जब हमने उसे थाने बुलाया, तो उसके पिता ने अपनी जेब में छिपाकर लाए ज़हर को वहीं खाने की कोशिश की. इस तरह की चालें चली जाती हैं, भावनात्मक ब्लैकमेल किया जाता है, जोड़े पर असहनीय दबाव डाला जाता है.

लता सिंह अपनी एक सहकर्मी की कहानी भी सुनाती हैं जो जाट समुदाय से ताल्लुक़ रखती है. ‘जिस आदमी को उसने अपना जीवनसाथी चुना, वह दक्षिण भारतीय इंजीनियर था. वे एक रिश्ते में थे, और उसे लगता था कि यह सही है. उसने उससे शादी कर ली. शादी के बाद उसके माता-पिता ने इस रिश्ते का विरोध किया. लगभग डेढ़ साल बाद उसकी मां ने मुझे फोन करना शुरू कर दिया. उसकी मां ने कहा कि परिवार ने इस फ़ैसले को मान लिया है, और अगर वह अपनी ज़िंदगी में ख़ुश है, तो उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं है.

मैंने उससे कहा कि यह अच्छी बात है. अगले दिन, उसकी मां, पिता और भाई आए- लेकिन वे अपने साथ एक शूटर भी लाए थे. वह उसे पहचान नहीं पाई. जब उसने पूछा कि वह कौन है, तो उन्होंने उसे बताया कि वह उसकी मौसी का बेटा है. पानी पीने के बाद उस आदमी ने उसे अपने पति को बुलाने के लिए कहा. वह अंदर गई, अपने पति को जगाया, और उससे कहा कि वह बाहर आकर उसके माता-पिता से मिल ले. जैसे ही वह ड्राइंग रूम में दाख़िल हुआ, उसे गोली मार दी गई… उस समय वह पांच से छह महीने की गर्भवती थी. उसका पति ज़मीन पर गिर पड़ा. वह चीख़ पड़ी. उसकी चीखें सुनकर पड़ोसी जमा हो गए और सब लोग भाग गए… आज, उसके परिवार में सिर्फ़ उसका बच्चा, उसके पति की मां और उसके पति की बहन हैं.

कानून

12 मार्च, 2026 को, कर्नाटक कैबिनेट ने ‘कर्नाटक विवाह में चयन की स्वतंत्रता और सम्मान तथा परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों की रोकथाम और निषेध विधेयक, 2026’ को मंज़ूरी दी, जिसे ‘एवा नम्मावा, एवा नम्मावा’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘वे हमारे हैं, वे हमारे हैं’. इस क़ानून का उद्देश्य विवाह में पसंद की आज़ादी देना और जाति-आधारित अपराधों की रोकथाम तथा निषेध करना, मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकना, अंतरजातीय विवाहों को सम्मान दिलाना, व्यक्तिगत पसंद में ज़बरदस्ती किए जाने वाले जाति-आधारित भेदभाव को रोकना है; और अंतर-जातीय विवाह संपन्न कराने के लिए ‘एवा नम्मावा एवा नम्मावा’ मंच का गठन करना है.

 

इस निबंध को लिखने को दौरान बार-बार भयानक तकलीफ़ की याद आती रही जो 1947 में मेरे विस्तारित परिवार को झेलना पड़ा था, जो मेरी रूह में बस गई है. तब भी और आज भी, एक औरत अपने परिवार और समाज की महज़ एक जायदाद है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं है- एक ऐसी ‘ट्रॉफ़ी’ जो उनकी इज़्ज़त की निशानी है. इस ‘इज़्ज़त’ की हिफ़ाज़त के नाम पर, उसकी अपनी इच्छाओं, उसकी अपनी पसंद और उसकी अपनी ख़ुशियों की बलि चढ़ाई जा सकती है.

और, कभी-कभी तो उसकी जान की भी.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

भारत में औरतों से नफ़रत और सांप्रदायिक व जातिगत द्वेष के उस जानलेवा सम्मिश्रण पर लिखे इस निबंध को मैं तीन कहानियों के साथ समाप्त करूंगा.

मुझे सबसे पहले ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ की कई यात्राओं में से एक के दौरान नफ़रत भरी हिंसा के पीड़ितों से हुई एक मुलाक़ात याद आती है. हम हरियाणा के एक गांव के एक छोटे-से घर में बैठे थे. एक नौजवान- चलिए, मैं उसे रोहित कह लेता हूं – ने हमें अपनी कहानी सुनाई. उसके पिता एक आंबेडकरवादी दलित और एक जूनियर सरकारी कर्मचारी थे. उन्होंने अपने दोनों बेटों को अपनी क्षमता के हिसाब से बेहतरीन शिक्षा देने की पूरी कोशिश की. रोहित का बड़ा भाई रोहतक की यूनिवर्सिटी में पढ़ने चला गया. ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उसने अपने माता-पिता को फोन पर बताया कि उसे अपनी एक जाट क्लासमेट से प्यार हो गया है.

उन दोनों ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया था. रोहित के भाई ने अपने माता-पिता से कहा, ‘हम समझते हैं कि एक जाट लड़की का किसी दलित लड़के से शादी करना कितना ख़तरनाक हो सकता है. इसलिए, हम आपको या उस लड़की के परिवार को यह नहीं बताएंगे कि हम कहां रहते हैं या क्या करते हैं. आप हमें दोबारा कभी नहीं देख पाएंगे. हम आपको किसी भी तरह के ख़तरे में नहीं डालना चाहते.’

लगभग दो साल तक उनकी कोई ख़बर नहीं मिली. फिर एक दिन रोहित के भाई ने अपने माता-पिता को दोबारा फोन किया. वह अब एक बेटी का बाप था. उसकी पत्नी दोबारा प्रेग्नेंट थी. लड़की के परिवार वालों ने फोन पर उसे भरोसा दिलाया था कि अब उन्होंने इस शादी को स्वीकार कर लिया है. वे अपने नवासी-नवासे के साथ समय बिताना चाहते थे. उन्होंने उन दोनों से वापस लौटने की गुज़ारिश की. रोहित का परिवार ख़ुशी से झूम उठा. पूरा परिवार फिर से एक हो गया.

लेकिन एक शाम लड़की के पिता, भाई और चचेरे भाई गाड़ी से उनके घर आए. उन्होंने अपनी राइफ़लें निकालीं, और रोहित के पिता, मां और भाई को गोली मारकर उनका हत्या कर दी. उन्होंने अपनी बेटी और बहन के पेट में भी गोली मारी, और फिर तेज़ी से वहां से भाग निकले. रोहित इत्तेफ़ाक़ से बच गया क्योंकि जब यह हत्याकांड हुआ, तब वह घर पर मौजूद नहीं था.

उसने कई हफ़्तों तक अस्पताल में अपनी भाभी की देखभाल की. ​​एक मेडिकल चमत्कार की वजह से उसकी भाभी और उसके गर्भ में पल रहा बच्चा- दोनों ही गोली लगने के बाद भी बच गए.

लेकिन परिवार पर एक और मुसीबत आने वाली थी. एक दिन मां ने अपने दोनों बच्चों को उठाया और बिना कुछ कहे रोहित को छोड़कर अपने मायके लौट गई. यह उसके पिता और भाइयों का घर था, जिन्होंने उसके पति और उसके माता-पिता की हत्या की थी, और उसकी जान लेने की भी कोशिश की थी. वह इन हत्याओं की एकमात्र गवाह थी. उसने अदालत में अपने पिता और भाइयों के ख़िलाफ़ गवाही देने से मना कर दिया. उन्हें ज़मानत पर जेल से रिहा कर दिया गया.

रोहित पूरी तरह टूट चुका था. बेसहारा और अकेला हो गया था. जिन लोगों ने उसके परिवार का क़त्लेआम किया था, उनके ख़िलाफ़ चल रहा आपराधिक मामला भी पूरी तरह बिखर चुका था. उसकी अपनी जान भी ख़तरे में थी. हमने उसे दिल्ली में अपने दफ़्तर में पनाह देने का फ़ैसला किया, जहां वह कई सालों तक रहा.

हम आज भी उन लोगों के खिलाफ़ इंसाफ़ के लिए आपराधिक मामला लड़ रहे हैं, जिन्होंने अपने ‘सम्मान’ की रक्षा के नाम पर रोहित के पूरे परिवार को ख़त्म कर दिया था. अब उसकी शादी हो चुकी है. शादी की रस्में और जश्न हमारे दफ़्तर के आंगन में ही आयोजित किए गए थे. उसकी बारात में मेरे सहकर्मी ही शामिल थे.

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मेरी दूसरी कहानी एक डॉक्टर के बारे में है, जो यूनाइटेड किंगडम में काम करता है. (मैंने उसकी पहचान गुप्त रखने के लिए कुछ विवरण बदल दिए हैं). एक दिन वह मेरे दफ़्तर आया. जब वह बात कर रहा था तो मुझे एहसास हुआ कि वह अपने उस गहरे दुख के बारे में मुझसे बात करना चाह रहा है. जिसका बोझ उसकी आत्मा पर बहुत भारी था.

कुछ साल पहले अपनी शादी टूट जाने के बाद उसे एक मुस्लिम महिला से प्यार हो गया था. मुंबई में रहने वाली उसकी मां ने तो आख़िरकार उसके इस फ़ैसले को मान लिया, लेकिन उसके बंगाली हिंदू पिता ने इस पर बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा किया. सालों बीत जाने के बाद भी उनका ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ.

वह लगातार यूनाइटेड किंगडम में अपने डॉक्टर बेटे के एम्प्लॉयर्स और पुलिस अधिकारियों को फोन करते रहते थे, जहां उनका बेटा अपनी पत्नी के साथ रहता और काम करता था. वह बार-बार उनके पास शिकायतें दर्ज कराते थे कि उनके बेटे की पत्नी एक आतंकवादी है. वह बार-बार अपने बेटे को फोन करके गालियां देते थे.

उसकी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन उसके दादा ने तो उस बच्चे का चेहरा देखने से भी मना कर दिया. डॉक्टर और उसके पिता के बीच का रिश्ता पूरी तरह से टूट गया. पांच साल बीत गए, और इस दौरान उन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई.

फिर एक दिन, उसके अपने शहर मुंबई से उसके एक दोस्त ने उसे फोन किया. उसने बताया कि उसके पिता को कैंसर हो गया है. उन्हें अपनी ग़लती का बहुत पछतावा था. वह कम-से-कम एक बार अपने बेटे से बात करना चाहते थे. क्या वह अपने पिता को माफ़ कर देगा? क्या वह इसके लिए राज़ी होगा?

डॉक्टर के दोस्त ने तुरंत उसके पिता के साथ ज़ूम कॉल पर बात करवाई. पिता ने अपने डॉक्टर बेटे से माफ़ी मांगी. जब कोलकाता में अपने घर पर कंप्यूटर स्क्रीन पर टिमटिमाती तस्वीरों में उस बूढ़े आदमी ने पहली बार अपने पोते को देखा तो वह रो पड़ा. उन्होंने काफ़ी देर तक बात की.

कॉल के कुछ घंटों बाद डॉक्टर की मां ने मुंबई से उसे फोन किया. वह बहुत घबराई हुई थी. उसने डॉक्टर को बताया कि कॉल के बाद उसके पिता घर से निकल गए थे और अभी तक वापस नहीं लौटे हैं. डॉक्टर ने मुंबई में अपने दोस्तों को फोन किया. उन्होंने पुलिस की मदद से उसके पिता की तलाश शुरू कर दी.

आख़िरकार, वह उन्हें मिल गए. मृत. उन्होंने ख़ुद अपनी जान ले ली थी.

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मेरी तीसरी कहानी वह है जो भारत के जाने-माने सामाजिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने मुझे सुनाई थी. वह पाकिस्तानी सामाजिक वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ बंटवारे से जुड़ी यादों पर मिलकर रिसर्च कर रहे थे. उन्हें एक सिख आदमी की कहानी पता चली, जिसका बेटा एक मुस्लिम औरत को अगवा करके घर ले आया था. उस बूढ़े आदमी ने अपने बेटे से बहुत मिन्नतें कीं कि वह उस औरत को आज़ाद कर दे. लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

जब बूढ़े आदमी के बेटे ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो उसने अपनी राइफल निकाली और अपने बेटे को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी.

नंदी के पाकिस्तानी रिसर्च पार्टनर ने बताया कि उन्होंने सीमा के दूसरी तरफ़ से भी लगभग ऐसी ही बातें सुनी थीं. यह भी 1947 के बंटवारे से मिली हमारी विरासत का ही एक हिस्सा है. यह भी मेरी रूह में गहरे तक बस गया है.

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)

(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)