हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर में हुए युवाओं के आंदोलन के दौरान ग़ैर-लाभकारी संस्थाएं- ख़ासकर ऐसी संस्थाएं, जो युवाओं के साथ काम करती हैं, उनके साथ खड़े नहीं दिखे. गिनती की कुछ संस्थाओं ने युवाओं के आंदोलन के समर्थन में कोई पोस्ट, स्टोरी या ट्वीट जारी किया. यानी जब युवा सत्ता को आईना दिखा रहे थे, तब सोशल सेक्टर ने उनकी मदद के लिए किसी भी तरह के डिजिटल संसाधन या सलाह मुहैया कराने की ज़हमत नहीं उठाई.
नरेंद्र मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड गवाह है कि वह किसी भी असहमति या आंदोलन से संवाद में तब तक यक़ीन नहीं करती, जब तक पानी सिर से ऊपर न जाने लगे. तब तक अड़ियल व अहंकारी रवैया अपनाए रखकर वह स्थितियों को और जटिल बनाती रहती है. सोमवार को भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जो बातचीत हुई है, उसे इसी रूप में देखा जा सकता है.
17 जुलाई 2022 को गिरफ्तार किए गए पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की कैद के चार वर्ष पूरे हो गए हैं, इस दौरान उन्होंने जेल के भीतर कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई, उच्च शिक्षा जारी रखी और सहबंदियों के बीच सकारात्मक बदलाव की पहल की. परिवार को अब भी उनकी रिहाई का इंतजार है.
दिल्ली के नागरिकों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 'हीट रजिस्ट्रियां' सौंपकर अत्यधिक गर्मी को मानवाधिकार का मुद्दा घोषित करने की मांग की है. ज्ञापन में कहा गया है कि भीषण गर्मी स्वास्थ्य, आजीविका और गरिमा पर असर डाल रही है.
नॉर्वे दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वहां की एक पत्रकार ने मीडिया के सवाल लेने को लेकर सवाल किया, लेकिन वे बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए. बाद में भारतीय दूतावास की प्रेस ब्रीफिंग में भी मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल पूछे गए.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के नेता विभिन्न विधानसभा चुनावों से पूर्व 'घुसपैठियों' को निकालने के दावे कर चुके हैं. बीते दिनों असम में अमित शाह ने ‘64 लाख घुसपैठियों’ के क़ब्ज़े का दावा किया, हालांकि इस बारे में गृह मंत्रालय का जवाब गंभीर सवाल खड़े करता है. एक आरटीआई आवेदन के जवाब में मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि उसके पास घुसपैठियों से जुड़ा कोई समेकित आंकड़ा नहीं है.
भारतीय न्यायिक व्यवस्था दोहरे संकट से गुज़र रही है. एक ओर न्यायिक क्षेत्र को कम बजट मिलता है और दूसरी ओर उपलब्ध बजट का पूरा और प्रभावी उपयोग नहीं हो पा रहा. नतीजा यह है कि पुलिस, जेल, न्यायालय, क़ानूनी सहायता, फॉरेंसिक और मानवाधिकार संस्थाएं, सभी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं.
इस ‘गणतंत्र’ के बंदियों को सुप्रीम कोर्ट के कथनानुसार व संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार कभी हासिल होगा? ‘जेल अपवाद है व ज़मानत नियम,’ यह धरातल पर फलीभूत कभी होगा या जेलों के यातनागृह में बंदियों को पीसकर भ्रष्ट अधिकारियों के पौ-बारह होते रहेंगे? स्वतंत्र पत्रकार और पटना की बेऊर जेल में विचाराधीन बंदी रूपेश कुमार सिंह का लेख.
पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने जिलाधिकारी को भेजे अपने एक आवेदन में आदर्श केंद्रीय कारा, बेऊर, पटना में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार एवं जेल प्रशासन द्वारा बंदियों के शोषण- उत्पीड़न के खिलाफ दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने की मांग की है. उन्होंने इस संबंध मेंं सिलसिलेवार तरीके से बंदियों के रोज़ाना संघर्ष के बारे में लिखा है.
नेल्ली के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि जो लोग बड़े पैमाने पर हिंसा झेल चुके हैं, उनमें से कई लोग अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने आज तक किसी को भी इस हद तक बेसहारा नहीं छोड़ा है, जैसा इन लोगों के साथ हुआ है.
सुधा भारद्वाज अपनी जेल डायरी, ‘फाँसी यार्ड से’, में बतलाती हैं कि उस चारदीवारी के पीछे किस तरह का सामाजिक भेदभाव होता है, यंत्रणा की कितनी परतें मौजूद हैं, कैसे एक यंत्रणा दूसरी को गाढ़ा कर देती है. किताब का चयनित अंश.
वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचादो को 2025 का शांति नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई है. नॉर्वेजियन समिति ने उन्हें लोकतंत्र और मानवाधिकारों के शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए सम्मानित किया. मचादो ‘लोकप्रिय पूंजीवाद’ की समर्थक हैं और मादुरो सरकार की समाजवादी नीतियों की मुखर आलोचक मानी जाती हैं.
सैयदा हमीद के मन में असम की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. लेकिन आज अचानक उन्हें अहसास कराया जा रहा है कि वे औरत हैं और मुसलमान हैं. उनकी तकलीफ़ कौन महसूस करना चाहता है?
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस समय क्रूरता के इतने स्तर और इतनी बारीकियां सक्रिय हैं कि उदार मूल्यों और दृष्टि की बात करना दयनीय और हास्यास्पद दिखता है. क्रूरता मनुष्यता का स्वभाव प्रतीत होती है, उदारता नहीं.
2024 से अब तक छत्तीसगढ़ में लगभग 589 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें आम नागरिक, सुरक्षा बल और माओवादी/नक्सली शामिल हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में देशभर में हुई कुल मौतों का लगभग 54% और इस अवधि के दौरान माओवादी-उग्रवाद से संबंधित मौतों का लगभग 80% हिस्सा है. ये आंकड़े एक बुनियादी लेकिन परेशान करने वाला सवाल उठाते हैं: मरने वाले कौन हैं?