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बनारसीदास चतुर्वेदी, जिन्हें हिंदी के लोगों ने भुला दिया

जयंती विशेष: हिंदी के लोग अब आम तौर पर लेखक और पत्रकार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को न याद करते हैं, न ही उनकी पत्रिका ‘विशाल भारत’ को. यहां तक कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद नहीं किया जाता.

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी (24 दिसंबर 1892 - 02 मई 1985). (फोटो साभार: अमेजॉन इंडिया)

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी (24 दिसंबर 1892 – 02 मई 1985). (फोटो साभार: अमेजॉन इंडिया)

कभी उनकी याद में कोई औपचारिक कार्यक्रम हो भी, तो उसमें उन्हें ‘अपने समय का अग्रगण्य संपादक’ बताकर या उनकी ‘विशिष्ट और स्वतंत्र वृत्ति’ को रेखांकित करके उनके प्रति अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली जाती है, जबकि एक भी पंक्ति में उनका परिचय देना हो तो कहा जाना चाहिए कि उनके जैसा शहीदों की स्मृति का पुरस्कर्ता (सामने लाने वाला) और छायावाद का विरोधी समूचे हिंदी साहित्य में कोई और नहीं हुआ.

कहते हैं कि वे किसी भी नई सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या राष्ट्रीय मुहिम से जुड़ने, नए काम में हाथ डालने या नई रचना में प्रवृत्त होने से पहले ख़ुद से एक ही सवाल पूछते थे कि उससे देश, समाज, उसकी भाषाओं और साहित्यों, ख़ासकर हिंदी का कुछ भला होगा या मानव जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्चतर मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी या नहीं?

इस प्रश्न का उत्तर पा लेने के बाद वे कोई निश्चय कर लेते तो न उससे फिरते थे, न लक्ष्य दूर देख निराश होते अथवा प्रतिबद्धताओं से विचलित होते थे. तब अभीष्ट के आड़े आने वाली कोई भी समस्या उस पर विजय के उनके अहर्निश प्रयत्नों से बड़ी नहीं हो पाती थी.

स्वाभाविक ही इस कारण उनके साथ कई दुर्भाग्यपूर्ण विवाद भी आ जुड़े. इनमें से एक का उनके द्वारा अपने बहुचर्चित पत्र ‘विशाल भारत’ में छायावाद और उसके स्तंभ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के विरुद्ध छेड़े गए अभियान से बेहद गहरा ताल्लुक है.

इस अभियान की हद यह थी कि ‘निराला’ ने छायावाद के पक्षधर नंददुलारे वाजपेयी द्वारा संपादित अर्धसाप्ताहिक ‘भारत’ में ‘वर्तमान धर्म’ शीर्षक से लेख लिखा तो चतुर्वेदी जी ने उसे ‘विशाल भारत’ में फिर से छापकर उसका अर्थ बताने वाले को 25 रुपये देने की घोषणा कर दी.

फिर तो ऐसा तूफान उठा कि कुछ न पूछिये. फिर भी चतुर्वेदी जी अपनी इस धारणा से टस से मस नहीं हुए कि निराला ने ‘वर्तमान धर्म’ में जो कुछ भी लिखा है, वह प्रलाप मात्र है.

लेकिन यह उनके जीवन का सिर्फ एक पक्ष है. दूसरे पक्ष पर जाएं तो शहीदों की स्मृतिरक्षा में मददगार साहित्य को प्रोत्साहन देने के उन्होंने जैसे प्रयत्न किए, शायद ही किसी और हिंदी संपादक ने किए हों!

प्रसंगवश, 1892 में 24 दिसंबर को फिरोज़ाबाद में पैदा हुए चतुर्वेदी जी 1913 में इंटर की परीक्षा पास करने के बाद पास ही स्थित फर्रुख़ाबाद के गवर्नमेंट हाईस्कूल में तीस रुपये मासिक वेतन पर अध्यापक नियुक्त हो गए थे.

लेकिन अभी कुछ ही महीने बीते थे कि उनके गुरु पंडित लक्ष्मीधर वाजपेयी ने, जो उन दिनों आगरा से ‘आर्यमित्र’ नाम का पत्र निकालते थे, उन्हें अध्यापन छोड़कर आगरा आने और ‘आर्यमित्र’ संभालने का आदेश सुना दिया.

दरअसल, वाजपेयी जी द्वारिकाप्रसाद सेवक के बुलावे पर उनके मासिक ‘नवजीवन’ के संपादक बनने वाले थे और ‘आर्यमित्र’ को ऐसे संपादक के हवाले कर जाना चाहते थे, जो उनके भरोसे पर खरा उतर सके.

चतुर्वेदी जी ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य भी कर ली थी, लेकिन जब तक वे आगरे का रुख़ करते, उन्हें इंदौर के उस डेली कॉलेज में नियुक्ति का आदेश मिल गया, जिसके लिए अपने हेडमास्टर एजाज़ आलम के कहने पर उन्होंने अत्यंत अनिच्छापूर्वक, महज़ उनका मन रखने के लिए, अर्ज़ी भेजी थी. फिर तो वाजपेयी जी ने भी उन्हें इंदौर जाने को कहकर धर्मसंकट से मुक्त कर दिया.

चतुर्वेदी जी को इंदौर में पहले तो डाॅ. संपूर्णानंद का साथ मिला, जो उसी कॉलेज में शिक्षक थे, फिर वहां हिंदी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ तो उसकी अध्यक्षता करने आए महात्मा गांधी के सान्निध्य व संपर्क ने उनकी लगातार बेचैन रहने वाली सेवा भावना व रचनात्मकता को नए आयाम दिए.

महात्मा गांधी ने 1921 में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की तो उनके आदेश पर चतुर्वेदी जी अपनी सेवाएं अर्पित करने वहां चले गए. इससे पहले उन्होंने चतुर्वेदी जी से हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर प्रतिष्ठित करने के अपने अभियान के संदर्भ में देश भर से अनेक मनीषियों के अभिप्राय एकत्र करवाए, जिसको पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया.

चतुर्वेदी जी ने अपने फर्रुख़ाबाद के अध्यापन काल में ही तोताराम सनाढ्य के लिए उनके संस्मरणों की पुस्तक ‘फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष’ लिख डाली थी और तभी ‘आर्यमित्र’, ‘भारत सुदशा प्रवर्तक’, ‘नवजीवन’ और ‘मर्यादा’ आदि उस समय के कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख आदि छपने लगे थे.

‘फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष’ के संस्मरणों में उस द्वीप पर अत्यंत दारुण परिस्थितियों में काम करने वाले भारत के प्रवासी गिरमिटिया मज़दूरों की त्रासदी का बड़ा ही संवेदनाप्रवण चित्रण था.

बाद में चतुर्वेदी जी ने गांधी जी के जीवन व आदर्शों से प्रभावित और उनमें अनुरक्त सदाशयी अंग्रेज़ सीएफ एंड्रयूज़ की मार्फत इन मज़दूरों की दुर्दशा का अंत सुनिश्चित करने के लिए बहुविध प्रयत्न किए.

काका कालेलकर के अनुसार राष्ट्रीयता के उभार के उन दिनों में एंड्रयूज़ जैसे विदेशी मनीषियों और मानवसेवकों की क़द्र करने का चतुर्वेदी जी का आग्रह बहुत सराहनीय था.

एंड्रयूज़ के निमंत्रण पर वे कुछ दिनों तक रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में भी रहे थे. वे एंड्रयूज़ को ‘दीनबंधु’ कहते थे और उन्होंने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर एक अन्य लेखक के साथ मिलकर अंग्रेज़ी में भी एक पुस्तक लिखी है, जिसकी भूमिका महात्मा गांधी द्वारा लिखी गई है.

लेकिन अध्यापन या कि शिक्षण का काम उन्हें इस अर्थ में कतई रास नहीं आ रहा था कि उसमें ठहराव बहुत था जबकि उनकी रचनात्मक प्रवृत्ति को हर कदम पर एक नई मंजिल की तलाश रहती थी. अंततः एक दिन उन्होंने गुजरात विद्यापीठ से अवकाश लेकर पूर्णकालिक पत्रकार बनने का फैसला कर डाला.

कलकत्ता से प्रकाशित मासिक ‘विशाल भारत’ ने उनके संपादन में अपना स्वर्णकाल देखा. उस समय का बिरला ही कोई हिंदी साहित्यकार होगा, जो अपनी रचनाएं ‘विशाल भारत’ में छपी देखने का अभिलाषी न रहा हो.

चतुर्वेदी जी के प्रिय अंग्रेज़ी पत्र ‘मॉडर्न रिव्यू’ के मालिक और प्रतिष्ठित पत्रकार रामानंद चटर्जी ही ‘विशाल भारत’ के भी मालिक थे. वे चतुर्वेदी जी की संपादन कुशलता और विद्वता के कायल थे और चतुर्वेदी जी भी उनका बहुत सम्मान करते थे, लेकिन संपादकीय असहमति के अवसरों पर मजाल क्या कि चतुर्वेदी जी उनका लिहाज करें.

ऐसे कई अवसर चर्चित भी हुए. चतुर्वेदी जी गणेशंकर विद्यार्थी को महात्मा गांधी के बाद अपने पत्रकारीय जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा मानते थे, जिनकी उन्होंने जीवनी भी लिखी है.

1930 में उन्होंने ओरछा नरेश वीरसिंह जू देव के प्रस्ताव पर टीकमगढ़ जाकर ‘मधुकर’ नाम के पत्र का संपादन किया. नरेश ने उन्हें उनके निर्विघ्न व निर्बाध संपादकीय अधिकारों के प्रति आश्वस्त कर रखा था लेकिन बाद में उन्होंने पाया कि चतुर्वेदी जी ‘मधुकर’ को राष्ट्रीय चेतना का वाहक और सांस्कृतिक क्रांति का अग्रदूत बनाने की धुन में किंचित भी ‘दरबारी’ नहीं रहने दे रहे, तो उसका प्रकाशन रुकवा दिया.

आज़ादी के बाद चतुर्वेदी जी बारह वर्ष तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे और 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. दो मई, 1985 को इस दुनिया से विदा लेने से पहले उन्होंने अपने खाते में ‘साहित्य और जीवन’, ‘रेखाचित्र’, ‘संस्मरण’, ‘सत्यनारायण कविरत्न’, ‘भारतभक्त एंड्रयूज़’, ‘केशवचन्द्र सेन’, ‘प्रवासी भारतवासी’, ‘फिज़ी में भारतीय’, ‘फिज़ी की समस्या’, ‘हमारे आराध्य’ और ‘सेतुबंध’ जैसी रचनाएं जमा कर ली थीं.

उन्होंने कई विदेश यात्राएं कीं और देश-विदेश में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक संस्थाओं और प्रतिभाओं के पुष्पन-पल्लवन में भी विशिष्ट योग दिया.

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के लोकप्रिय लेखक सुधीर विद्यार्थी, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए सशस्त्र मुक्तियुद्ध लड़ने वाले अनेक क्रांतिकारी योद्धाओं/शहीदों के जीवन व संघर्ष के कितने ही विस्मृति के गर्त में दफन रहस्यों का उत्खनन किया है, कहते हैं कि वे 1972 में चतुर्वेदी जी द्वारा संपादित आगरा के ‘युवक’ मासिक के ‘स्वतंत्रता संग्राम योद्धांक’ से प्रेरित होकर ही क्रांतिकारियों की कीर्ति रक्षा के मिशन में लगे. वे चतुर्वेदी जी को अपना ‘गुरुवर’ बताते हैं और ख़ुद को उनका ‘प्रिय विद्यार्थी’.

कवि राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह के शब्द उधार लें तो ‘जिनकी वाणी में सदा जीवन का उल्लास, थे प्रसन्नमुद्रा सतत श्री बनारसीदास.’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फैज़ाबाद में रहते हैं.)