Constitution of India

छत्तीसगढ़: नर्सिंग कॉलेजों में महिलाकर्मियों के लिए 100 फीसदी आरक्षण हाईकोर्ट ने रद्द किया

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने दिसंबर 2021 में सहायक प्रोफेसर (नर्सिंग) और व्याख्याताओं के पदों के लिए एक विज्ञापन जारी किया था, जिसमें केवल महिला उम्मीदवार ही भर्ती और नियुक्ति के लिए पात्र बताई गई थीं. अदालत ने इस कदम को भारतीय संविधान का उल्लंघन करार दिया.

नीट के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार, कहा- परीक्षा संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन

राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि परीक्षा ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और राज्य बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है क्योंकि नीट परीक्षा सीबीएसई/एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित है, जो तमिलनाडु बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम से काफ़ी अलग है.

समलैंगिकता का अपराधीकरण हमारे समाज में अन्याय की कई कहानियों में से एक था: सीजेआई

वर्ष 2018 में उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को असंवैधानिक क़रार देते हुए इसे ग़ैर-आपराधिक ठहराया था. वर्तमान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ यह निर्णय देने वाली पीठ में शामिल थे.

कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर केंद्र का फैसला न लेना लोकतंत्र के लिए घातक: पूर्व जज

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू की कॉलेजियम पर सार्वजनिक टिप्पणियों को निंदनीय बताते हुए कहा कि अदालत के फैसले स्वीकार करना उनका कर्तव्य है. उन्होंने जोड़ा कि अगर यह गढ़ (न्यायपालिका) भी गिर जाता है तो हम अंधकार युग के गर्त में चले जाएंगे.

संविधान की रक्षा करना ही देशभक्ति का सच्चा प्रतीक है: सीताराम येचुरी

माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने गणतंत्र दिवस पर एक संबोधन में कहा कि संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी के लिए न्याय की गारंटी देता है. ये मूलभूत मूल्य हैं जिन पर संविधान टिका हुआ है और आज यही मूल्य ख़तरे का सामना कर रहे हैं.

संविधान केवल दस्तावेज़ नहीं है बल्कि जीवन जीने का एक माध्यम है

जब संविधान के ‘बुनियादी ढांचे के सिद्धांत’ पर विवाद छिड़ा हुआ है, तो ऐसे में ज़रूरी मालूम होता है कि इसकी मूल भावना और उसके उद्देश्य को आम लोगों तक ले जाया जाए क्योंकि जब तक ‘गण’ हमारे संविधान को नहीं समझेगा हमारा लोकतंत्र सिर्फ एक ‘तंत्र’ बनकर रह जाएगा.

उपराष्ट्रपति को सीजेआई का जवाब- संविधान का मूलभूत ढांचा ध्रुव तारे की तरह मार्गदर्शन करता है

भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जब आगे का रास्ता जटिल होता है तो भारतीय संविधान की मूल संरचना अपने व्याख्याताओं और कार्यान्वयन करने वालों को मार्गदर्शन और निश्चित दिशा दिखाती है. बीते दिनों उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा था कि 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मूलभूत ढांचे में संसद द्वारा बदलाव न किए जाने की ग़लत परंपरा रखी थी.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की हालिया टिप्पणियों के पीछे क्या मक़सद है?

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने केशवानंद भारती फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है, जिसका आशय है कि संसद को संविधान में संशोधन करने का संप्रभु अधिकार होना चाहिए, चाहे वह संविधान के बुनियादी ढांचे का अतिक्रमण ही क्यों न करता हो.

भागवत व धनखड़ के बोल: सवाल संविधान की सर्वोच्चता का है…

संघ प्रमुख की मुसलमानों से अपना ‘श्रेष्ठताबोध’ छोड़ने को कहकर उनकी भारतीयता की शर्त तय करने की कोशिश हो या उपराष्ट्रपति की विधायिका का ‘श्रेष्ठताबोध’ जगाकर उसके व न्यायपालिका के बीच का संतुलन डगमगाने की, दोनों के निशाने पर देश का संविधान ही है.

उपराष्ट्रपति ने फिर न्यायपालिका को घेरा, कहा- संसदीय क़ानून को अमान्य करना लोकतांत्रिक नहीं

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम निरस्त किए जाने पर कहा कि ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ. कोई भी संस्था लोगों के जनादेश को बेअसर करने के लिए शक्ति या अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती है. इससे पहले भी वह सुप्रीम कोर्ट के इस क़दम की आलोचना कर चुके हैं.

धर्मांतरण एक गंभीर मुद्दा, इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

छलपूर्ण धर्मांतरण को रोकने के लिए केंद्र और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश देने का आग्रह करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम पूरे देश के लिए चिंतित हैं. अगर यह आपके राज्य में हो रहा है, तो यह बुरा है. अगर नहीं हो रहा, तो अच्छा है. इसे राजनीतिक मुद्दा न बनाएं.

जमीयत ने पांच राज्यों के धर्मांतरण-रोधी क़ानूनों के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपनी याचिका में दावा किया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में धर्मांतरण-विरोधी क़ानूनों को अंतर-धार्मिक जोड़ों को ‘परेशान’ करने और उन्हें आपराधिक मामलों में फंसाने के लिए लागू किया गया है. 

अनुच्छेद 19 व 21 के तहत मौलिक अधिकार निजी व्यक्तियों/संस्थाओं के ख़िलाफ़ भी लागू होते हैं: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में निहित मौलिक अधिकारों को लेकर मूल सोच यह है कि इन्हें केवल राज्य के ख़िलाफ़ लागू किया जा सकता है, लेकिन समय के साथ यह बदल गया है.

कोई मामला छोटा नहीं होता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना संवैधानिक कर्तव्य: सुप्रीम कोर्ट

एक मामले पर सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के लिए कोई भी मामला छोटा नहीं होता. अगर हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कार्रवाई नहीं करते हैं और राहत नहीं देते हैं, तो हम यहां क्या कर रहे हैं. बीते दिनों केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने शीर्ष अदालत को ज़मानत और बेतुकी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई न करने का सुझाव दिया था.

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए समिति गठित करने संबंधी विधेयक राज्यसभा में पेश

माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता, तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए भारत के संविधान में संशोधन को लेकर एक निजी विधेयक पेश किया. संविधान (संशोधन) विधेयक-2022 में भारतीय चुनाव आयोग का एक स्थायी स्वतंत्र सचिवालय स्थापित करने की भी बात कही गई है.