लोहिया की इतिहास दृष्टि के आलोक में 22 जनवरी का आयोजन उदार हिंदू पर कट्टरपंथ की विजय है

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा करोड़ों साधारण आस्थावान हिंदुओं के लिए उनके आराध्य का भव्य मंदिर बनने का विशेष पर्व था. उनमें से अधिकांश के मन में कोई कट्टरता नहीं रही होगी. लेकिन इसके आयोजकों और प्रायोजकों ने इसके राजनीतिक निहितार्थ के बारे में शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है.

राष्ट्र के नाम पत्र: हम पागलपन के बजाय विवेक को चुनें

क्या हमारे बच्चे ऐसे भारत में बड़े होंगे जहां धर्म हमारी सभी पहचानों, बातचीत, जीवन के नियमों को समाहित कर लेता है- दूसरों को कम मानवीय, दूसरे दर्जे के का बना देता है?

रोहिंग्याओं के ख़िलाफ़ ऑनलाइन नफ़रत की अनदेखी पर फेसबुक के ख़िलाफ़ कोर्ट पहुंचे शरणार्थी

जातीय हिंसा के कारण म्यांमार से भागने को मजबूर हुए रोहिंग्या शरणार्थियों द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि फेसबुक अपने प्लेटफॉर्म पर उनके ख़िलाफ़ हेट स्पीच पर कार्रवाई करने में विफल रहा है, जिससे उनके साथ हिंसा होने का ख़तरा मंडराता रहता है.

एडिटर्स गिल्ड ने केंद्र से कहा- प्रसारण सेवा विधेयक ​‘अत्यधिक हस्तक्षेप​’ करने वाला है

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर को पत्र लिखकर कहा है कि नया विधेयक ​‘संविधान द्वारा गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता की भावना के प्रतिकूल​’ साबित होगा. गिल्ड को डर है कि विधेयक प्रसारण सलाहकार परिषद के माध्यम से ​‘व्यापक सेंसरशिप ढांचे​’ के निर्माण के लिए आधार तैयार करेगा.

आदिवासियों को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जाएगा: असम मुख्यमंत्री

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा है कि असम समान नागरिक संहिता को लागू करेगा, लेकिन इसका स्वरूप अन्य भाजपा शासित राज्यों में अमल में लाए जा रहे मॉडल से अलग होगा. इसमें कुछ संशोधनों के साथ आदिवासी समुदाय को छूट दी जाएगी.

मध्य प्रदेश में शिवराज का ‘बुलडोज़र’ कमज़ोरों के ख़िलाफ़ ही क्यों चला है?

विशेष रिपोर्ट: 2020 में भाजपा की सत्ता में वापसी के बाद से लगभग हर संगीन अपराध में न्यायिक फैसले का इंतजार किए बिना आरोपियों को सज़ा देने के लिए उनसे जुड़े निर्माण अवैध बताकर बुलडोज़र चला दिया गया.  कथित अपराध की सज़ा आरोपी के परिजनों को देने की इन मनमानी कार्रवाइयों का शिकार ज़्यादातर मुस्लिम, दलित और वंचित तबके के लोग ही रहे.

संविधान का ढांचा तो औपचारिक रूप से बरक़रार है, पर उसकी आत्मा का हनन रोज़ हो रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जैसे अक्सर क्रांति को क्रांति की संतानें ही खा जाती हैं वैसे ही संविधान की संतानें, राजनीतिक दल, लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई सरकारें संविधान को कुतर-काट रहे हैं.

कांग्रेस का दावा- मिज़ो संस्कृति की रक्षा करने वाला अनुच्छेद 371 जी ख़तरे में है

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि एक सरकार और एक पार्टी जिसने अनुच्छेद 370 को हटाया, वह 371 'जी' को भी हटा सकती है. यह अधिनियम मिज़ो समुदाय की धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, मिज़ो प्रथागत क़ानून, नागरिक और आपराधिक न्याय प्रशासन, भूमि स्वामित्व आदि की रक्षा करता है.  

हमारा संविधान: अनुच्छेद 105 – संसद सदस्यों के विशेषाधिकार

वीडियो: सांसदों के पास क्या कोई विशेष अधिकार होते है? क्या उन्हें दीवानी और फौजदारी मामलों में कोई ख़ास सुरक्षा मिलती है? अगर लोकसभा या राज्यसभा में कोई सदस्य अपनी बात रखता है, तो क्या उस पर अपनी बात आज़ादी से कह पाने के लिए संविधान में कोई ख़ास अनुच्छेद है, बता रही हैं सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अवनि बंसल.

हमारा संविधान: क्या एक व्यक्ति दो अलग-अलग सीट से चुनाव लड़ सकता है?

वीडियो: क्या एक व्यक्ति राज्यसभा और लोकसभा दोनों से चुनाव लड़ सकता है, क्या एक व्यक्ति दो अलग-अलग सीट से चुनाव लड़ सकता है, क्या कोई सांसद अपनी सदस्यता इसलिए खो सकता है कि वो लगातार बिना बताए संसद नहीं आ रहा है? संविधान इस पर क्या कहता है?

हमारा संविधान: राज्यसभा के सभापति-उपसभापति और लोकसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के वेतन-भत्ते

वीडियो: राज्यसभा के सभापति और उपसभापति, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को दिए जाने वाले वेतन और भत्ते क्या हैं? इन्हें क्या-क्या सुविधाएं प्रदान की जाती हैं और इन्हें तय कौन और किस क़ानून के तहत करता है? 

आरोपियों को चुप रहने का अधिकार, उन्हें बोलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को उस पर लगे आरोपों के ख़िलाफ़ अधिकार देता है, कहा कि सभी आरोपियों को चुप रहने का अधिकार है और जांचकर्ता उन्हें बोलने या अपराध स्वीकारने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. जांच में ‘सहयोग’ का मतलब ‘स्वीकारोक्ति’ नहीं हो सकता.

जम्मू कश्मीर को अब केवल न्यायपालिका का ही सहारा है

महबूबा मुफ़्ती लिखती हैं, 'जम्मू कश्मीर के लोगों ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के साझा मूल्यों पर जिस देश से जुड़ने का फैसला किया, उसने हमें निराश कर दिया है. अब, केवल न्यायपालिका ही है जो हमारे साथ हुई ग़लतियों और नाइंसाफ़ी को सुधार सकती है.'

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