यूपी: पूर्वांचल के गन्ना बेल्ट में विस्थापित गन्ना शोध केंद्र की सुध लेने वाला कोई नहीं है

ग्राउंड रिपोर्ट: पूर्वी यूपी के गन्ना किसानों को उन्नत क़िस्म की प्रजाति मुहैया कराने, सूखा, जलभराव व ऊसर क्षेत्रों में उपयोगी प्रजातियों को विकसित करने जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए 1939 में गोरखपुर के कूड़ाघाट में गन्ना शोध केंद्र की स्थापना की गई. 2017 में केंद्र की ज़मीन एम्स बनाने के लिए देते हुए इसे पिपराइच स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन आज तक वहां शोध केंद्र की एक ईंट भी नहीं रखी गई है.

यूपी: देवरिया में आईटीआई की अधबनी इमारत कई युवाओं के टूटे सपनों की नींव पर खड़ी है

ग्राउंड रिपोर्ट: साल 2014 में देवरिया ज़िले में भाटपाररानी विधानसभा क्षेत्र के भवानी छापर गांव में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आईटीआई का शिलान्यास किया था. ग्रामीण युवाओं को आस थी कि वे तकनीकी हुनर सीखकर आजीविका कमा सकेंगे. सात साल बीतने के बावजूद यह आईटीआई अब तक शुरू नहीं हो सका और रोजी-रोटी की तलाश में स्थानीय युवा अन्य राज्यों में मज़दूरी करने के लिए पलायन को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश: गोरखपुर ज़िले की निषाद बहुल सीटों का चुनावी समीकरण क्या है

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले में नौ विधानसभा क्षेत्र- गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवा, पिपराइच, कैम्पियरगंज, चौरी चौरा, चिल्लूपार, बांसगांव और खजनी हैं. बांसगांव और खजनी क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इनमें से पांच- गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवा, पिपराइच, कैम्पियरगंज, चौरी चौरा में निषाद समुदाय की अच्छी-ख़ासी संख्या है. चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में भी निषाद मतदाता ठीक-ठाक हैं.

यूपी: भाजपा से सपा पहुंचे स्वामी प्रसाद पडरौना की जगह ​फ़ाज़िलनगर से चुनाव क्यों लड़ रहे हैं

स्वामी प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के वक्त भाजपा को छोड़कर उसे क़रारा झटका दिया है. भाजपा ने नुकसान की भरपाई करने के लिए कांग्रेस के बड़े नेता पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री तथा स्वामी प्रसाद मौर्य के प्रतिद्वंद्वी आरपीएन सिंह को अपने साथ लिया है. दोनों कद्दावर नेताओं के जनाधार की परीक्षा इस चुनाव में होनी है.

‘मेरे बेटे ने मोहब्बत की थी लेकिन उस पर रेप का दाग़ लगाया गया, मैं इंसाफ़ के लिए लड़ूंगा’

बीते दिनों गोरखपुर की एक अदालत में 31 वर्षीय दिलशाद की गोली मारकर की गई हत्या को 'बलात्कारी' की हत्या बताया जा रहा है. दिलशाद के पिता ने इसे 'ऑनर किलिंग' बताते हुए कहा कि उनके बेटे के हत्यारोपी भागवत निषाद उनके क़रीबी दोस्त थे और दिलशाद ने हिंदू धर्म अपनाकर उनकी बेटी से शादी की थी. इससे नाराज़ भागवत ने दिलशाद पर अपहरण और पॉक्सो के तहत केस दर्ज करवाया था.

उत्तर प्रदेश: आरपीएन सिंह के भाजपा में आने से कितनी बदलेगी कुशीनगर की राजनीति

योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा छोड़ सपा में जाने और फिर आरपीएन सिंह के कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद उत्तर प्रदेश में कुशीनगर ज़िले के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह उलट-पुलट गए हैं. आरपीएन के ज़रिये भाजपा मौर्य के राजनीतिक प्रभाव को काटने में लगी है तो सपा मौर्य के साथ अपने पार्टी के बड़े नेताओं के बीच संतुलन बिठाने में लगी है.

उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या योगी आदित्यनाथ को उनके गढ़ में घेर सकेगा विपक्ष

गोरखपुर शहर सीट पर विपक्ष बेमन से चुनाव लड़ता रहा है. पिछले तीन दशक से सपा, कांग्रेस, बसपा के किसी भी नेता ने इस सीट को केंद्रित कर राजनीतिक कार्य नहीं किया, न ही इसे संघर्ष का क्षेत्र बनाया. हर चुनाव में इन दलों से नए प्रत्याशी आते रहे और चुनाव बाद गायब हो जाते रहे. इसी के चलते भाजपा यहां मज़बूत होती गई. 

यूपी: गोरखपुर विश्वविद्यालय के शिक्षकों-छात्रों ने कुलपति के ख़िलाफ़ मोर्चा क्यों खोल रखा है

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजेश सिंह अपने 15 महीनों के कार्यकाल के दौरान लगातार विवादों में रहे हैं. फैकल्टी सदस्य और विद्यार्थी उन पर अनियमितता, मनमाने निर्णयों और शिक्षकों के साथ बदसलूकी के आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं.

क्या बीआरडी ऑक्सीजन त्रासदी को लेकर डॉ. कफ़ील ख़ान को जानबूझकर निशाना बनाया गया

डॉ. कफ़ील ख़ान की किताब ‘द गोरखपुर हॉस्पिटल ट्रेजडी: अ डॉक्टर्स मेमॉयर ऑफ अ डेडली मेडिकल क्राइसिस' अगस्त 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों के सच को दफ़न करने की कोशिश को बेपर्दा करती है और व्यवस्था द्वारा उसकी नाकामी को छुपाने की साज़िश को सामने लाती है.

उत्तर प्रदेश: क्या बड़ी रैलियां करके कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन पाने में सफल होगी

गोरखपुर की रैली से कांग्रेस ने दिखाया है कि अब वह भी भाजपा, सपा, बसपा की तरह बड़ी रैली करने में सक्षम है. पार्टी पूर्वांचल में एक और रैली करने के बाद लखनऊ में बड़ी जनसभा करने की तैयारी में है. बड़ी रैलियां या जनसभाएं चुनावी सफलता की गारंटी नहीं हैं, लेकिन इनके ज़रिये कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश करेगी कि लोग उससे जुड़ रहे हैं.

गोरखपुर ऑनर किलिंग: ‘मेरा भाई घर की रीढ़ था, वो टूट गई, हमारा परिवार बिखर गया’

बीते दिनों गोरखपुर ज़िले के उरुवा ब्लॉक में ग्राम पंचायत अधिकारी अनीश कुमार की सरेबाज़ार हत्या कर दी गई थी. अनीश ने अपनी सहकर्मी दीप्ति मिश्रा से अंतरजातीय विवाह किया था. बताया गया है कि दीप्ति के दलित व्यक्ति से विवाह करने से नाराज़ उनका परिवार काफ़ी समय से अनीश को धमका रहा था.

उत्तर प्रदेश: क्या आज़मगढ़ के पलिया गांव में दलितों को सबक सिखाने के लिए उनके साथ बर्बरता की गई?

बीते 29 जून को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के रौनापार के पलिया गांव के एक व्यक्ति से कुछ लोगों का विवाद हो गया था. मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों पर भी कथित रूप से हमला कर दिया गया. आरोप है कि इसके बाद बदले की कार्रवाई करते हुए पुलिस ने इस दलित बाहुल्य गांव में प्रधान समेत कई घरों में जमकर तोड़फोड़ की और उन्हें गिरा दिया गया. पुलिस ने ग्रामीणों के इस आरोप से इनकार करते हुए अज्ञात लोगों

यूपी: पंचायत चुनाव ड्यूटी में कोविड से गुज़रे 2,020 कर्मचारियों के परिजन मुआवज़े के पात्र माने गए

योगी सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग से पंचायत चुनाव ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले दो हज़ार से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों के परिवारों को अनुग्रह राशि देने की सिफ़ारिश की है. सरकार के पास मुआवज़े के लिए कुल 3,092 आवेदन आए थे, जिनमें से 2,020 को पात्र माना गया है.

यूपी: निषाद पार्टी के सामने वीआईपी को खड़ा करना क्या भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा है

उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद वोट अहम हो गए हैं, जिसे लेकर निषाद पार्टी अपने प्रभुत्व का दावा करती रही है. राज्य में 150 से अधिक विधानसभा सीटें निषाद बहुल हैं, ऐसे में यह समुदाय निर्णायक भूमिका में हो सकता है. यही वजह है कि विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट बढ़ते ही निषाद वोटों पर अपने कब्ज़े को लेकर निषाद पार्टी और बिहार की विकासशील इंसान पार्टी के बीच खींचतान शुरू हो गई है.

यूपी: ज़िला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के नतीजे पर जश्न महज़ भाजपा की खुशफ़हमी है

उत्तर प्रदेश के ज़िला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में तिकड़म, धनबल, दबाव आदि के सहारे मिली जीत को जिस तरह 'जनता-जर्नादन का आशीर्वाद' और 'जनविश्वास की जीत' बताया जा रहा है, उससे लगता है कि हमें लोकतंत्र के लिए नई परिभाषा ढूंढना शुरू कर देना चाहिए.

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