पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे प्रदर्शन के मद्देनज़र मुंबई पुलिस ने 20 जुलाई के बाद बुधवार (22 जुलाई) को भी राज्य के कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बच्चों, स्थानीय नेताओं और कॉमेडियन को बिना किसी नोटिस, वॉरंट या कारण बताए हिरासत में लिया. इस मामले से संबंधित कुछ युवाओं ने द वायर को बताया कि पुलिस ने उन्हें फोन पर धमकी भी दी थी.
महाराष्ट्र के लातूर ज़िले के खरोला गांव में 13 से 15 वर्ष आयु के तीन मुस्लिम छात्रों को एक खंभे से बांधकर कुछ लोगों द्वारा बेरहमी पीटा गया. पुलिस के दख़ल देने के बावजूद अधिकारियों ने पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही मामला दर्ज कर लिया. लोगों का दबाव बढ़ने के कारण कुछ घंटों बाद आरोपी मराठा पुरुषों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई.
भारत की जेलों में जान गंवाने वाले बंदियों की मौत की श्रेणी अक्सर 'स्वाभाविक या प्राकृतिक मौत' के रूप में दर्ज होती है, जबकि मुमकिन है कि समय से और सही इलाज न मिलने से भी ऐसी मौतें हुई हों, जो स्वाभाविक नहीं हैं. जब तक हिरासत में होने वाली मौतों की रूटीन तरीके से जांच नहीं होगी और उन्हें कठोर एवं स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ेगा, तब तक लंबी बीमारी में समुचित इलाज का इंतज़ार करते क़ैदी
एनआईए ने अधिकार कार्यकर्ताओं- वर्नोन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा की ज़मानत रद्द करने के लिए मुंबई प्रेस क्लब में आरोपियों के कुछ पत्रकारों से अनौपचारिक मुलाकात को आधार बताया है. एजेंसी ने पिछले महीने तेलुगु कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव और वकील-शिक्षाविद सुधा भारद्वाज की ज़मानत रद्द करने के लिए दायर अर्ज़ी में भी यही तर्क दिए थे.
आरक्षण नियमों के उल्लंघन पर द वायर की रिपोर्ट के बाद महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने एक नया नोटिफिकेशन जारी कर उन समुदायों के छात्रों को लेने के लिए एक ख़ास अभियान चलाया गया जिन्हें वह साल-दर-साल बाहर रखती आ रही थी. हालांकि, पीएचडी प्रोग्राम का 2026 बैच पहले ही मार्च में शुरू हो चुका है और छात्र अपना कोर्सवर्क पूरा करने वाले हैं. अब आने वाले बैच में केवल अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों के छात्र होंगे.
फैक्ट चेक: केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को विपक्ष द्वारा फैलाया गया ‘प्रोपगैंडा’ कहकर ख़ारिज कर दिया. हालांकि भाजपा राज के पिछले एक दशक में भारत के अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदुत्व चरमपंथियों के हमलों का सबसे ज़्यादा सामना करना पड़ा है.
मुंबई के मीरा रोड स्थित रिहायशी इलाके में बकरीद की तैयारियों को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश के तहत ईद की कुर्बानी से पहले सोसाइटी की मैनेजिंग कमेटी द्वारा निर्धारित जगह पर बकरे रखने के विरोध में हिंदुत्ववादी समूह सुअर लेकर पहुंचे. इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें अफ़रातफ़री के बीच पुलिस, पत्रकारों और लोगों की भीड़ को देखा जा सकता है.
द वायर की यह पड़ताल दिखलाती है कि बीतते समय के साथ दोषी याचिकाएं एनआईए के लिए दोषसिद्धि हासिल करने का एक सटीक और आसान रास्ता बन गई हैं. लेकिन, इस आसान रास्ते ने सैकड़ों युवाओं को इतने लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रखने का काम किया है कि उनके पास जेल से रिहाई पाने के लिए अपना दोष स्वीकार कर लेने के अलावा कोई वास्तविक विकल्प ही नहीं बचता.
एल्गार परिषद केस: मुंबई प्रेस क्लब बैठक को लेकर एनआईए की दो कार्यकर्ताओं की ज़मानत रद्द करने की मांग
विशेष एनआईए अदालत में दायर आवेदन में एजेंसी ने दावा किया कि 19 जनवरी को दोनों आरोपी- वरवरा राव और सुधा भारद्वाज मुंबई प्रेस क्लब गए थे और वहां उन्होंने मामले के अपने सह-आरोपियों से बातचीत की, जो उनकी ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन है. कोर्ट ने उनकी ज़मानत शर्तों में अपने सह-आरोपियों से संवाद करने पर रोक लगाई गई थी.
बीते 23 अप्रैल को महाराष्ट्र के यवतमान ज़िले में एल्विन और उनका साथी मोहम्मद नदाफ निसार क़ुरैशी केरल के पलक्कड़ ज़िले के पट्टांबी कस्बे से फल लदा ट्रक लेकर मध्य प्रदेश जा रहे थे, तभी रास्ते में हथियारबंद लोगों के एक समूह ने उनकी गाड़ी को रोककर हमला कर दिया. कुरैशी गंभीर रूप से घायल है और आईसीयू में भर्ती है. इसके बावजूद पुलिस ‘रोड रेज’ का केस दर्ज कर हल्की धाराएं ही लगाई है.
टीसीएस की आठ महिला और एक पुरुष कर्मचारियों द्वारा दर्ज कराई गई नौ शिकायतों के आधार पर पांच एफआईआर दर्ज की गई है. इसमें यौन उत्पीड़न और हिंदू धार्मिक भावनाओं का अपमान करने का आरोप है. हालांकि, इनमें से अधिकांश शिकायतें कई महीनों या सालों पहले की घटनाओं से संबंधित थीं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि सभी एफआईआर आधी रात को दर्ज की गई हैं.
आतंकवाद के आरोपी अपने मुवक्किलों द्वारा दोषी याचिकाएं देने के बाद भी उनका पक्ष लेने को लेकर वकीलों के पास अलग-अलग कारण हैं, लेकिन वे सब इस बात पर सहमत हैं कि एनआईए ही इन याचिकाओं को बढ़ावा दे रही है और यहां तक कि उसके लिए दबाव भी बना रही है.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एल्गार परिषद केस में गिरफ़्तार किए गए सांस्कृतिक कलाकार तथा कार्यकर्ता सागर गोरखे और रमेश गायचोर को ज़मानत दे दी. दोनों 2020 से मुंबई के तलोजा जेल में बंद हैं. इस रिहाई के आदेश के बाद अब गिरफ़्तार किए गए 16 लोगों में से केवल मानवाधिकार कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग ही जेल में हैं.
लंदन में रहने वाले डॉक्टर और लोकप्रिय यूट्यूबर संग्राम पाटिल, जो भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की तीखी आलोचना के लिए जाने जाते हैं, को अपनी भारत यात्रा के दौरान मानहानि के मुकदमे से लेकर लुकआउट सर्कुलर जारी होने और यहां तक कि हवाई अड्डे पर हिरासत में लिए जाने तक की कार्रवाई का सामना करना पड़ा है.
एनआईए के प्रभावित करने वाले दोषसिद्धि आंकड़ों को लेकर कई आरोपियों, उनके वकीलों और यहां तक कि एजेंसी से जुड़े रहे एक व्यक्ति ने द वायर से बात की और बताया कि क्यों एनआईए के इतने सारे मामले आरोपियों के कबूलनामों के साथ उन्हें दोषी मान लिए जाने के साथ ख़त्म होते हैं.