मानसून सत्र की उत्पादकता का सवाल प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से पूछा जाना चाहिए, विपक्ष से नहीं

विपक्षी दलों द्वारा संसद की कार्रवाई रोकना संसद की कार्रवाई का हिस्सा ही है और यह सुनिश्चित करना सत्ता पक्ष का काम है कि संसद में हंगामे की नौबत न आए और वह सुचारु रूप से चलती रहे. विपक्ष का काम ही सरकार से सवाल पूछना है, अपने सवालों के जवाब न पाकर विरोध प्रदर्शन के अलावा वह और क्या करता? हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल पूछने और जवाब पाने की संसद के अलावा कोई और जगह है

आज़ाद-ख़याली का मतलब क्या है? भाषा, वर्चस्व और हमारी गुलामी के सवाल

कैसी विडम्बना है. एक ओर तो आज़ादी की धारणा के साथ अपनी मिट्टी, हवा, पानी और इतिहास की बात जुड़ी है, वहीं जब संभ्रांत तबके अपनी ज़बान और संस्कृति हम पर थोपते हैं, हम एक गुलामी से आज़ाद होकर दूसरी गुलामी में जकड़े जाते हैं.

दो साल की देरी के बाद पीएम केयर्स ने बताया- 31 मार्च 2025 तक उसके पास 8,452 करोड़ रुपये थे

पीएम केयर्स फंड से 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष के दौरान 87 लाख रुपये ख़र्च किए गए. 31 मार्च 2025 तक इस फंड के अकाउंट्स में 8,452 करोड़ रुपये मौजूद थे. पीएम केयर्स फंड की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के फैलने के दौरान आपात स्थिति और आपदाओं से निपटने के लिए की गई थी. फंड की ऑडिट रिपोर्ट्स के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.

‘हमें सिलाई सिखाने के नाम पर ले गए थे’: पूर्व माओवादी स्त्रियों ने कहा, ‘धोखे से कराया गया रैंप वॉक’

छत्तीसगढ़ के रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हुए एक फैशन शो की रैंप वॉक में पूर्व माओवादी महिलाओं ने हिस्सा लिया था. सरकार इसे अपनी सफलता की तरह पेश कर रही है, लेकिन पूर्व माओवादी महिलाओं का कहना है कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर धोखे से सुकमा से रायपुर ले जाया गया और वहां रैंप वॉक की ट्रेनिंग देकर इस कार्यक्रम में शामिल करवाया गया.

गांधी का सैंतालीस: उनकी ‘आख़िरी लड़ाई’ की गाथा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुष्यमित्र ने 'गांधी का सैंतालीस' में महात्मा गांधी के आख़िरी साल की कहानी अनेक मार्मिक ब्योरों के साथ लिखी है. गांधी-निंदा और अपमान के इस संघ-आयोजित समय में जो लोग गांधी-सचाई का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा जानना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है.

आज़ादी के मायने: उमर की क़ैद इस आज़ाद मुल्क के नागरिकों का इम्तिहान है

'उमर, तुम्हारा एक और स्वतंत्रता दिवस जेल में बीतना इस आज़ाद मुल्क की हालत पर बेहद तल्ख़ टिप्पणी है. लेकिन शायद उससे भी तल्ख़ बात यह है कि हममें से बहुतों ने यह टिप्पणी पढ़ना ही छोड़ दिया. लंबी क़ैद पहले ख़बर बनती है, फिर पुरानी ख़बर, और आख़िर में हमारे ज़ेहन का कोई धुंधला कोना. पहले बेचैनी होती है, फिर आदत पड़ती है और फिर ख़ामोशी.'

सेंसरशिप को सेंसर करने का वक़्त हो चुका है

यह हमारी सरकार है; जिसे हम नागरिकों ने चुना है और जिसकी हमारे प्रति जवाबदेही बनती है. इसे जायज़ आलोचना, टिप्पणियों और पत्रकारिता पर रोक लगाने या उसे कुचलने की अपनी आदत पर काबू पाना चाहिए. सरकार को देश में सेंसरशिप लागू करने वाले सभी क़दम तुरंत पीछे खींचने चाहिए.

विभाजन की मौन त्रासदी: संघर्ष के बोझ तले स्त्रियों की ज़िंदगियां

किसी स्त्री की अस्मिता पर हमला होता है तो वह किसी राष्ट्र की हार या जीत नहीं, पूरी मनुष्यता की हार होती है. इसलिए विभाजन की स्त्रियों को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है. यह वर्तमान से सवाल करना है. यह पूछना कि क्या हमने सीखा है कि किसी स्त्री का शरीर किसी समुदाय की संपत्ति नहीं, उसका अपना अस्तित्व है? क्या हमने समझा कि हिंसा का बदला किसी निर्दोष से नहीं लिया जा सकता?

इतिहास को केवल प्रमाण पर आधारित होना चाहिए: इरफान हबीब

साक्षात्कार: ‘हिंदू राष्ट्र अपने आप में विरोधाभासी शब्द है’; ‘ज्ञान न तो भारतीय होता है, न इंग्लिश, वह सिर्फ़ ज्ञान होता है.’ पढ़िए इतिहासकार इरफान हबीब से द वायर हिंदी की खास बातचीत, जिसमें वे इतिहास के पुनर्लेखन, आरएसएस पर फासीवाद के प्रभाव, भारतीय ज्ञान परंपरा और इतिहास के राजनीतिक इस्तेमाल पर चर्चा कर रहे हैं.

‘जेएनयू भिखारी है, यहां मंदिर लाओ’: भारतीय ज्ञान परंपरा सम्मेलन में कुलपति ने द्रौपदी को बताया ‘पहली नारीवादी’

बीएचयू में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने द्रौपदी को ‘पहली नारीवादी’ बताया और कहा कि जेएनयू के इतिहासकारों ने तथ्यों और व्याख्या का क्रम उलट दिया. उन्होंने जेएनयू को ‘भिखारी’ बताते हुए वहां बाबा वेंकटेश्वर का मंदिर लाने की बात कही, ताकि विश्वविद्यालय के लिए अधिक धन जुटाया जा सके.

मोदी-शाह का ‘गुड कॉप-बैड कॉप’ खेल अब बेअसर

प्रधानमंत्री की छवि बचाने के लिए ख़ुद नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाई दे रहे हैं. भागवत का खुद को निष्पक्ष दिखाना भी इसी पुरानी रणनीति का हिस्सा है.

वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज: एनएमसी के पास कार्रवाई के स्पष्ट मानदंड नहीं, फिर कैसे रद्द हुई मान्यता?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस की अनुमति जनवरी 2026 में वापस ले ली थी. अब एक आरटीआई के जवाब में आयोग ने बताया है कि उसके पास यह तय करने वाला कोई अलग दस्तावेज़ नहीं है कि किस कमी पर चेतावनी दी जाए या अनुमति वापस ली जाए. ऐसे में संस्थान के ख़िलाफ़ की गई इस कार्रवाई के आधार पर सवाल उठते हैं.

क्या कश्मीर में जेन ज़ी आंदोलन की ज़मीन तैयार हो रही है?

कश्मीर में बीते दो दशकों में बड़ी हुई पीढ़ी ने 1990 का आतंकवाद नहीं देखा, लेकिन उसने भाजपा-पीडीपी की साझेदारी, उसका टूटना, विधानसभा का विघटन, 370 का अंत और उसके बाद के सात वर्षों का ‘नया कश्मीर’ देखा है. इसलिए उसे केवल पुराने इतिहास से नहीं समझाया जा सकता. वह मौजूदा समय का हिसाब मांगेगी.

सरकारी आयोजनों में आदिवासी नृत्य: संस्कृति का सम्मान या दिल बहलाने का तमाशा?

विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष: देश के सबसे बड़े नेता के सामने हज़ारों आदिवासियों से उनका पारंपरिक नृत्य करवाने की मानसिकता ब्रिटिश काल से जुड़ती है, जब आदिवासी समुदायों को ‘मुख्यधारा’ से अलग देखा जाता था, और उनके पहनावे व कला को 'प्रदर्शनी' की तरह पेश किया जाता था. आज सरकारी आयोजनों में आदिवासियों को एक जैसी पोशाक पहनाकर नचवाना, उसी औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार है.

कलाओं से क्या बदलता है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कलाओं को लेकर व्यापक समझ और मानसिकता ख़ासी तंगदिल और कुंद ज़ेहन है. कला के बारे में जो व्यापक चर्चा होती रहती है उसमें उसकी शक्ति को इस पैमाने पर अक्सर मापा जाता है कि उसका क्या व्यापक प्रभाव पड़ा. जिन कलाओं का ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता या जिनमें व्यापक समाज अधिक रुचि नहीं लेता, उनकी उपेक्षा भी होती रहती है.

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