‘हमारे यहां समस्याएं भी संस्कारी होती हैं; चुनाव होने तक चुपचाप कोने में बैठी रहती हैं’

भारतीय लोकतंत्र में शायद अब एक नया मौसम जोड़ देना चाहिए; गर्मी, बारिश, सर्दी और 'चुनाव-उपरांत त्याग काल'. चुनाव के दौरान नागरिक 'विकास' सुनेंगे और चुनाव के बाद 'संयम' का पाठ पढ़ेंगे.

देश से संयम की अपील के बीच प्रधानमंत्री की भव्य रैलियां, रोड शो जारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से विभिन्न तरह की कटौती की अपील के बाद उनके कई शहरों के दौरों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. जिस रविवार पीएम नागरिकों से ‘संकट के समय’ में ‘सामूहिक त्याग’ की बात कही, उसी दिन उन्होंने तीन राज्यों के चार शहरों में भव्य व्यवस्था वाले समारोहों में हिस्सा लिया. सोमवार को भी उनके ऐसे कार्यक्रम जारी हैं.

विजय: एक सुपरस्टार, जो लंबे समय से राजनीतिक पारी की तैयारी कर रहे थे

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार विजय का राजनीतिक उभार रातों-रात नहीं हुआ. यह पटकथा वर्षों से बेहद सावधानी से तैयार की गई थी.. फिल्मों, प्रतीकों, सार्वजनिक हस्तक्षेपों और कई बार सोची-समझी चुप्पियों के ज़रिये. बरसों से बुनी जा रही इस कहानी का एक चरण 10 मई को विजय के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ पूरा हुआ.

क्षत-विक्षत लोकतंत्र में बुद्धिजीवियों की अप्रासंगिकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के दुर्व्‍याख्या और विस्मृति के दौर में भी कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्‍याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं. वे स्मृति का आग्रह कर रहे हैं. इसमें जोखिम है, देर-सबेर हो सकता है कि उन पर हमले हो जाएं. पर ये बुद्धिजीवी रक्तबीज हैं: उन्हें हटा या नष्ट या हाशिये पर भी डाल दिया जाए तो नए युवा बुद्धिजीवी पैदा होंगे जो उनके बौद्धिक सत्याग्रह को आगे ले जाएंगे.

बंगनामा: क्या शपथ ग्रहण समारोह संवैधानिक कार्य न रहकर सार्वजनिक राजनीतिक रंगमंच बन चला है?

ब्रिगेड परेड मैदान में पश्चिम बंगाल के नए सीएम का शपथ ग्रहण समारोह कर भाजपा कुछ संकेत दे रही है. प्रथम, कि वो जनता को पार्टी की विपुल सफलता के विशाल जन उत्सव में हिस्सा लेने का अवसर दे रही है. दूसरा, रवीन्द्र जयंती के अवसर पर इस आयोजन से वह सिद्ध करना चाहती है कि वह पश्चिम बंगाल की संस्कृति में ढली हुई बंगाल की ही पार्टी है, बाहर की नहीं. बंगनामा की पैंतालीसवीं क़िस्त.

मोहन भागवत की सुरक्षा पर कितना ख़र्च करती है सरकार, गृह मंत्रालय ने जानकारी देने से किया इनकार

एक आरटीआई आवेदन के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की सुरक्षा पर होने वाले ख़र्च की जानकारी मांगने पर गृह मंत्रालय और सीआईएसएफ ने सूचना देने से इनकार कर दिया है. मंत्रालय ने सुरक्षा और निजता का हवाला दिया, जबकि सीआईएसएफ ने ख़ुद को क़ानून से छूट प्राप्त संस्था बताते हुए जानकारी देने से मना कर दिया.

बंगाल में भाजपा की जीत में एसआईआर मददगार रहा, आंकड़ों से मिलते हैं संकेत

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 150 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी. इनमें से भाजपा ने 99 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में वह ऐसी सिर्फ 19 सीटों पर जीती थी.

इज़्ज़त, ख़ून और प्रेम: ‘लव जिहाद’ की साज़िशें और ‘सम्मान’ के नाम पर हत्या

1947 में भारत से पाकिस्तान का अलग होना सिर्फ़ ज़मीन के लिए लड़ी गई लड़ाई नहीं थी, यह औरतों के शरीर और समुदाय की 'इज़्ज़त' के लिए भी उतनी ही बड़ी लड़ाई थी. यह टकराव आज भी दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के बीच जारी है. इस स्त्री-द्वेषी दृष्टि की वजह से महिलाओं को आज भी यह चुनने की आज़ादी नहीं है कि वे किससे दोस्ती करें, किससे प्रेम या किसके साथ संबंध बनाएं और किससे शादी करें.

‘तुम बिहारी लोग यहां ज़मीन ले रहे हो’: दिल्ली में युवक की हत्या से पहले आरोपी पुलिसकर्मी ने क्या कहा था?

बीते सप्ताह दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक हेड कॉन्स्टेबल ने कथित तौर पर बिहारी पहचान को लेकर एक 22 वर्षीय डिलीवरी बॉय पांडव कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी. बीते कुछ बरसों में भारत में धर्म और जाति के आधार पर हो रही हिंसा सामान्य हो चली है. इसमें क्षेत्रीय भेदभाव आधारित हिंसा की ख़बरें भी आती रही हैं, हालांकि बिहारी प्रवासी इस हिंसा के निशाने पर दशकों से रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में ‘खिले’ कमल की उत्तर प्रदेश के चुनाव पर कैसी छाया पड़ेगी?

पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने केंद्र की अपनी सत्ता और चुनाव आयोग की शक्तियों के अभूतपूर्व दुरुपयोग की मार्फत जिस तरह 293 सीटों का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता है, निस्संदेह, उससे अखिलेश यादव की चिंताएं कई गुनी हो जानी चाहिए. इसलिए और कि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में सत्तारूढ़ होने के कारण इस प्रदेश में भाजपा के सामने ऐसा करने में कोई समस्या ही नहीं है.

रघु राय ने वो हिंदुस्तान दिखाया, जो कई बार हम देख नहीं पाते

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: रघु राय ने शुरुआत तो फोटो-पत्रकार के रूप में की थी पर वे जल्दी ही फोटो-कलाकार हो गए. एक स्तर पर उन्होंने अपनी कला से भारतीय जीवन का गुणगान ही किया- उसका उत्सव मनाया, एक तरह की भारत-लीला रची. ऐसी लीला, जिसमें कोई नायक नहीं है- जीवन ही नायक है.

महत्वपूर्ण से अति महत्वपूर्ण होते अमित शाह: भाजपा में मोदी के बाद कौन?

2024 के बाद के घटनाक्रम इस सवाल को जन्म देते हैं कि क्या अमित शाह सिर्फ दूसरे नंबर के नेता हैं, जिन्हें नरेंद्र मोदी अपनी राजनीति मज़बूत करने के लिए आगे कर रहे हैं, या फिर 2029 पर नज़र टिकाए भाजपा, जो 2024 जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहती, किसी उत्तराधिकार योजना पर काम कर रही है.

इंजीनियर, पत्रकार, छात्र: नोएडा मज़दूर आंदोलन में हिंसा के आरोप में यूपी पुलिस ने किन्हें गिरफ़्तार किया है?

मई दिवस विशेष: नोएडा मज़दूर आंदोलन से जुड़े मामले में कई लोगों की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं. परिजन और वकील आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें बिना पर्याप्त प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया. पुलिस इसे साज़िश बता रही है. मामला अब श्रम अधिकारों से आगे नागरिक स्वतंत्रताओं की बहस बन गया है.

मई दिवस: हाशियाकरण झेलते मज़दूर कैसे करें नई चुनौतियों का सामना?

मज़दूरों के पास निश्चित काम के घंटे, छुट्टियां, या सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) की कमी है. अधिकांश असंगठित मज़दूरों की आय बहुत कम है. नौकरी की असुरक्षा और जोखिम भरे माहौल में काम करने को मजबूर मज़दूर अक्सर भुखमरी या गरीबी के कगार पर रहते हैं. विकास कार्यों में अहम भूमिका निभाने के बावजूद, उन्हें उन सुख-सुविधाओं से दूर रखा जाता है, जो वे ख़ुद बनाते हैं.

क्या भारत में अब निष्पक्ष चुनाव दूर की कौड़ी हो रहे हैं?

बंगाल विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने अपने सारे संसाधन भाजपा के लिए इस्तेमाल किए. सर्वोच्च न्यायालय ने भी चुनाव आयोग को पूरी छूट देकर परोक्ष रूप से भाजपा का साथ दिया. यह मॉडल अगर जनता ने स्वीकार कर लिया तो भारत में चुनाव स्टालिन के रूस में होने वाले चुनावों की तरह हो जाएंगे, जिनका नतीजा सबको वोट देने के पहले ही पता होगा.

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