एक आरटीआई के जवाब से पता चला है कि ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग के पास बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. उच्चायोग ने जो आंकड़े दिए हैं, वे एक ग़ैर-सरकारी संगठन से लिए गए हैं, जिससे भारत सरकार की निगरानी और दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं.
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गौतम अडानी और सागर अडानी ने अमेरिका के सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) के कानूनी समन को अपने अमेरिकी वकीलों के माध्यम से स्वीकार करने पर सहमति दे दी है. इसके साथ ही भारत सरकार की आपत्तियों के कारण 14 महीनों से अटकी समन प्रक्रिया समाप्त हो गई है. अब अदालत में आगे की कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है.
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी नियमावली पर रोक लगाई है जो उसी के आदेश के कारण बनाई और घोषित की गई थी. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जिस तरह ‘सवर्ण’ समुदायों का एक हिस्सा भड़क उठा. संख्या में कम होने पर भी इस समुदाय की ताक़त कितनी अधिक है और वह कितना प्रभावी है, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से पता लगता है.
चंडीगढ़ के आर्ट कॉलेज ऑडिटोरियम में एल्सव्हेयर फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'मैं तुम हूं, तुम मैं हो' नाम से हुए कहानी पाठ में चेमेगोइयां समूह से जुड़े सदस्य सिर्फ़ कहानियां नहीं सुना रहे थे. यह इतिहास को इंसानियत की भाषा में पढ़ना था. यह याद दिलाना था कि हम सब हिंसक हो सकते हैं. पर हम सब मानवीय भी हो सकते हैं. चुनाव हमेशा हमारे हाथ में रहता है.
बंगाल के कुछ हिस्सों में पूजी जाने वाली मनसा देवी की गाथा से देश के आदिवासी तथा देशज सांस्कृतिक परंपराओं दोनों का ही मुख्य सामाजिक धारा में लड़खड़ाते, बाधित, और अधूरे समावेश की कहानी समझ सकते है. शिव की पुत्री होकर भी वह सवर्ण जातियों की श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकतीं क्योंकि उनकी माता अनार्य हैं, क्योंकि वह परलोक की नहीं, इसी धरती और जंगल की हैं, आदिवासी हैं.
गुजरात के सूरत के सलाबतपुरा इलाके में भाजपा कारपोरेटर पर फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर सैकड़ों मुस्लिम मतदाताओं को ‘मृत’ घोषित कर नाम कटवाने का आरोप लगा है. स्थानीय लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कर कार्रवाई और जांच की मांग की है.
केंद्र सरकार ने वायु और जल प्रदूषण कानूनों के तहत उद्योगों को दी जाने वाली मंज़ूरी की प्रक्रिया आसान कर दी है. संशोधनों से बार-बार नवीनीकरण और नियमित निरीक्षण की बाध्यता कम होगी, जिसका फायदा उठाकर उद्योग प्रदूषण बढ़ा सकते हैं. पर्यावरणविदों ने कमजोर निगरानी और प्रवर्तन पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
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