कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस बार जब हमें स्वतंत्र हुए 79 वर्ष और कुछ ही महीनों में लोकतंत्र बने 77 वर्ष होने वाले हैं, तो एक बड़ा फ़र्क यह पड़ा है कि अब हमने डर से मुक्त होने की शुरुआत कर दी है. यह रास्ता हमें निडर होकर आंदोलन करने वाले युवाओं ने दिखाया है.
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बुधवार रात मेटा के प्लेटफॉर्म- फेसबुक और इंस्टाग्राम दोनों से हटाई गई द वायर की रिपोर्ट में बताया गया था कि पैलेट गन से घायल होने के दस साल बाद भी इसके पीड़ित रोज़ाना संघर्ष कर रहे हैं. फरवरी 2026 से अब तक, और ख़ासकर पिछले एक महीने में फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब ने सरकारी आदेशों के आधार पर द वायर और द वायर हिंदी की कम से कम 22 पोस्ट भारत में दिखने पर रोक लगाई है.
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले में जपतलाई गांव में स्थित आदिवासी आवासीय स्कूल में बीते 10 अगस्त को ज़मीन पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया, जिसके बाद क्रमशः 8, 12 और 14 साल की तीन छात्रों की मौत हो गई और तीन गंभीर हालत में इलाजरत हैं. बताया गया है कि बिस्तरों की कमी के चलते बच्चे ज़मीन पर चटाई बिछाकर सोया करते थे. घटना के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस स्कूल का लाइसेंस रद्द करने का आदेश
सत्ता पक्ष और विपक्ष के टकराव के बीच मानसून सत्र के आखिरी दिन राज्यसभा और लोकसभा दोनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई. इससे पहले राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हल्द्वानी में कांग्रेस की रैली के बाद रामलीला मैदान में कथित तौर पर कराए गए ‘शुद्धिकरण’ हवन को लेकर सदन में कड़ी नाराजगी जताई. उन्होंने इसे अपमानजनक बताते हुए कहा कि इसे लेकर एफआईआर होनी चाहिए.
पिछले एक दशक में कई छात्र आंदोलनों के दौरान बेसिर-पैर की अफ़वाहों को राजनीतिक नैरेटिव का रूप दिया गया. अब आंदोलन करने वाले युवाओं पर पैलेट, लाठियां चलने के बाद, उन्हें 'देशद्रोही', 'गटर जेनेरशन' कहे जाने, भद्दी गालियां दिए जाने के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत उनका समर्थन करने लगे हैं. यह सच है या पिछली कई बार की तरह सरसंघचालक इसे अफ़वाह बताकर मुकर तो नहीं जाएंगे?
तमिलनाडु विधानसभा में यह प्रस्ताव ऐसे समय पारित हुआ है, जब संसद में नए सिरे से परिसीमन विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना को लेकर द्रमुक के रुख़ पर सवाल उठ रहे थे. हालांकि, द्रमुक ने अप्रैल में लाए गए इस संविधान संशोधन विधेयक को विफल कराने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन तब वह विपक्षी 'इंडिया' ब्लॉक का हिस्सा थी.
ओडिशा में बॉक्साइट खदान की प्रस्तावित परियोजना के कारण ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी ज़िलों में फैली सिजीमाली पहाड़ियां अपने अस्तित्व को बचाने की एक अहम लड़ाई लड़ रही हैं. खनिज निकालने की इस होड़ में एक तरफ आर्थिक विकास के दावे हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों की अपने जंगलों, पानी के स्रोतों, रोजी -रोटी और ज़मीन से जुड़े सांस्कृतिक रिश्तों के भविष्य की कई चिंताएं हैं.
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