देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.
वीडियो
→नेपाल की अधूरी क्रांति?
→सभी ख़बरें
एनजीटी ने अपने हालिया आदेश में कहा है कि वाराणसी में गंगा नदी के किनारे 2023 में टेंट सिटी का निर्माण पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते हुए किया गया था. बताया गया है कि निकाय ने इसके लिए 17.12 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे अब तक वसूल नहीं किया गया है.
गुवाहाटी के दिसपुर थाने में दर्ज शिकायत में विपक्षी दलों ने दावा किया कि असम भाजपा अध्यक्ष और सांसद दिलीप सैकिया 'वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने' की कथित साज़िश का नेतृत्व कर रहे हैं. उनका दावा है कि भाजपा विधायकों को निर्देश दिया गया है कि वे राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से कम से कम 60 सीटों पर भाजपा-विरोधी वोटर्स के नाम मतदाता सूची से हटवाना सुनिश्चित करें.
किश्तवाड़ ज़िले में भाजपा के नेताओं द्वारा रतले विद्युत परियोजना के काम में बाधा उत्पन्न करने के बाद एक महीने के भीतर दूसरी बार मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन से निषेधाज्ञा लागू करने का आग्रह किया है. कंपनी ने इसके लिए 'कामगारों की सुरक्षा' और 'सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी चिंताओं' का हवाला दिया है.
कैग की एक रिपोर्ट में मोदी सरकार की प्रमुख योजना, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के क्रियान्वयन में गंभीर ख़ामियां सामने आई हैं. योजना के तहत 94.53% लाभार्थियों के बैंक खाते विवरण अमान्य या अनुपलब्ध मिले, साथ ही कई जगह किसी उम्मीदवार की एक तस्वीर की कई जगह लगी मिली, साथ ही फ़र्ज़ी मोबाइल नंबर जैसी गंभीर अनियमितताएं भी सामने आईं.
अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के प्रमुख साहित्यकारों से बातचीत के ज़रिये यह पड़ताल की गई कि वर्तमान में हिंदी की स्थिति क्या है, अनुवाद की भूमिका कितनी निर्णायक है और हिंदी किस हद तक वैश्विक भाषा के रूप में उभर पाई है. उनके विचार हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं.
पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.
संपर्क करें

