देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.