फरवरी 2016 में जेएनयू के छात्रों की राजद्रोह मामले में गिरफ़्तारी के दस साल बाद शिक्षकों और छात्रों का कहना है कि आज सार्वजनिक विश्वविद्यालय अपनी पुरानी पहचान की सिर्फ़ परछाई भर रह गए हैं. भाजपा की विचारधारा से मेल न खाने वाले कार्यक्रमों को नियमित रूप से रद्द किया जा रहा है और नियुक्तियां विशेषज्ञता के बजाय राजनीतिक निष्ठा के आधार पर की जा रही हैं.