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(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

दिल्ली: जीबी पंत अस्पताल के नर्सिंग अधीक्षक ने मलयालम में न बोलने संबंधी आदेश पर माफ़ी मांगी

दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल ने नर्सिंग के कर्मचारियों के लिए सिर्फ़ हिंदी या अंग्रेज़ी में बात करने वाला आदेश जारी किया था और विवाद के बाद इसे वापस ले लिया गया था. नर्सिंग अधीक्षक ने कहा कि दरअसल मरीज़ यह मान लेते हैं कि उन्हें कुछ गंभीर बीमारी है और इसलिए उनकी हालत छिपाने के लिए दूसरी भाषा में बात की गई है.

(फोटो: पीटीआई)

दिल्ली: सरकारी अस्पताल की नर्सों द्वारा मलयालम में बात न करने का आदेश विरोध के बाद वापस

दिल्ली के सरकारी अस्पताल गोविंद बल्लभ पंत इंस्टिट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रैजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च ने शनिवार को जारी एक सर्कुलर में नर्सिंग स्टाफ से सिर्फ हिंदी और अंग्रेज़ी में ही संवाद करने का आदेश दिया गया था. ऐसा न करने पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कही गई थी.

सीजेआई एसए बोबडे. (फोटो: पीटीआई)

आंबेडकर ने संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था: प्रधान न्यायाधीश बोबडे

देश के प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे ने कहा ​है कि आंबेडकर की राय थी कि चूंकि उत्तर भारत में तमिल स्वीकार्य नहीं होगी और इसका विरोध हो सकता है जैसे कि दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध होता है. लेकिन उत्तर भारत या दक्षिण भारत में संस्कृत का विरोध होने की कम आशंका थी और यही कारण है कि उन्होंने ऐसा प्रस्ताव दिया किंतु इस पर कामयाबी नहीं मिली

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मंगलेश डबराल का जाना और पहाड़ों पर कविता की लालटेन बुझ जाना

वीडियो: हिंदी की बिंदी में आज हम जिस कवि को याद कर रहे हैं, वे हैं मंगलेश डबराल, जिन्होंने हाल ही में इस दुनिया को अलविदा कह दिया है.

मंगलेश डबराल. (फोटो साभार: फेसबुक/@mangalesh.dabral.7)

मंगलेश डबराल: मैं चाहता हूं कि स्पर्श बचा रहे…

स्मृति शेष: मंगलेश डबराल उस यातना को जानते थे जो मनुष्य ने मनुष्य को दी है. दुनिया की अलग-अलग भाषाओं से किए गए उनके अनुवाद इस बात के साक्षी हैं. इसीलिए वे उस संघर्ष की कठिनाई से भी परिचित थे जो इस यातना की संस्कृति को ख़त्म करने का है.

रघुवीर सहाय (फोटो साभार: विकीपीडिया)

रघुवीर सहाय: अकड़ और अश्लीलता से मुक़ाबला

राज्य का रुतबा इंसान से बड़ा हो, यह रघुवीर सहाय को बर्दाश्त नहीं. वह इंसान से उसकी आज़ादी की इच्छा छीन लेता है. हर व्यक्ति को आज़ादी का एहसास हो और वैसे मौके ज़्यादा से ज़्यादा पैदा कर सके, जिनमें वह खुद को ख़ुदमुख़्तार देख सके, उसे किसी सत्ता के अधीन और निरुपाय होने का बोध न रहे, यह हर मानवीय उपक्रम और साहित्य का भी दायित्व है.

केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: दूरदर्शन/यू ट्यूब)

केदारनाथ सिंह: दुनिया से मिलने को निकला एक कवि

कविता का पूरा अर्थ हासिल कर पाना और संप्रेषणीयता का प्रश्न, हर कवि को इन दो कसौटियों पर अनिवार्यतः कसा जाता था. केदारनाथ सिंह की कविता, हर खरी कविता की तरह इन दोनों के प्रलोभन से बचती थी.

इस्मत चुग़ताई. [जन्म- 21 अगस्त 1915-अवसान 24 अक्टूबर 1991] (फोटो साभार: पेंगुइन इंडिया)

इस्मत चुग़ताई: परंपराओं से सवाल करने वाली ‘बोल्ड’ लेखक

इस्मत कहा करती थीं, ‘मैं रशीद जहां के किसी भी बात को बेझिझक, खुले अंदाज़ में बोलने की नकल करना चाहती थी. वो कहती थीं कि तुम जैसा भी अनुभव करो, उसके लिए शर्मिंदगी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है, और उस अनुभव को ज़ाहिर करने में तो और भी नहीं है क्योंकि हमारे दिल हमारे होंठों से ज़्यादा पाक़ हैं…’

प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936) (फोटो साभार: रेख्ता डॉट ओआरजी/विकीमीडिया/John Hoyland, Lebanon, 2007)

राष्ट्रवाद और डंडावाद

प्रेमचंद महात्मा गांधी की आंदोलन पद्धति के मुरीद थे. सशस्त्र आतंक के ज़रिये क्रांति या मुक्ति के नारे प्रेमचंद का खून गर्म नहीं कर पाते क्योंकि वे हिंसा के इस गुण या अवगुण को पहचानते थे कि वह कभी भी शुभ परिणाम नहीं दे सकती.

Hindi Alphabets

हिंदी थोपने की अनावश्यक आक्रामकता ख़ुद उसके लिए नुक़सानदेह है

अक्सर देखा गया है कि ग़ैर-हिंदीभाषियों को हिंदी अपनाने का उपदेश देने वाले ख़ुद अंग्रेज़ी की राह पकड़ लेते हैं. यह प्रश्न बार-बार उठा है कि कितने हिंदीभाषियों ने अन्य भारतीय भाषाएं सीखी हैं?

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

लोकभाषाओं के बढ़ते जश्न और घटता ओहदा

विश्व में वैज्ञानिक लेखों का दो तिहाई हिस्सा अंग्रेज़ी में लिखा जाता है और बिना अंग्रेज़ी के आजकल विद्यावर्धन नहीं हो सकता. पर यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे लेखों का एक तिहाई, जो भी एक बड़ी संख्या है, दूसरी भाषाओं में है. पर इनमें भारत की बड़ी लोकभाषाएं शामिल क्यों नहीं हैं?

प्रेमचंद.

साहित्यिक कुपाठ के निशाने पर प्रेमचंद

जून महीने के आख़िरी हफ्ते में मासिक पत्रिका हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा कि प्रेमचंद यथास्थितिवादी, प्रतिगामी थे और उनकी 25-30 कहानियों को छोड़कर अधिकतर कहानियां ‘कूड़ा’ हैं.

नंदकिशोर नवल.

नंदकिशोर नवल: शेष है साहित्य ही

मेरा जीवन क्षणिक है, मैं इस अनंत में एक कण हूं लेकिन मैं हूं और मेरे होने का अर्थ है, अपने बारे में यह नवलजी का विश्वास था और इसका प्रमाण वे तमाम प्रकाशित और अप्रकाशित कृतियां हैं, जिनमें वे जीवित हैं.

आयुष सचिव राजेश कोटेचा. (फोटो: ट्विटर)

प्रशिक्षण के दौरान आयुष सचिव के ग़ैर-हिंदी भाषियों से बैठक छोड़कर जाने को कहने पर हुआ विवाद

बीते दिनों आयुष मंत्रालय के एक राष्ट्रीय प्रशिक्षण सत्र में आयुष सचिव राजेश कोटेचा ने कहा था कि जो प्रतिभागी हिंदी नहीं बोलते वे छोड़कर जा सकते हैं क्योंकि वह अच्छी तरह से अंग्रेज़ी नहीं बोल सकते. उनके बयान की तमिलनाडु के नेताओं ने तीखी आलोचना करते हुए उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की मांग की है.

प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936) (फोटो साभार: रेख्ता डॉट ओआरजी)

प्रेमचंद के विचारों को उनके जन्म के सौ साल बाद याद करने की ज़रूरत क्यों है…

विशेष: प्रेमचंद अगर आज के हालात, ख़ासकर तथाकथित संस्कृति बचाने वालों को देखते, तो शायद अवसाद में चले जाते. उन्हें संस्कृति राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस्तेमाल होने वाला महज़ साधन लगती थी और उनके अनुसार यही तथाकथित संस्कृति, सांप्रदायिकता को भी स्वार्थ पूरे करने के अवसर देती थी.