ईरान ठीक कह रहा है कि प्रश्न युद्धविराम का नहीं, युद्ध कभी न हो, इसका है. इसकी गारंटी कौन करेगा? दुनिया में ऐसी कोई नैतिक शक्ति नहीं जो स्थायी शांति के लिए पहले लेने का साहस कर सके. कभी पूरी दुनिया में अपने नैतिक स्वर के कारण सुने जाने वाले भारत की बोलती बंद है.
उत्तम नगर में जो हो रहा है, होने दिया जा रहा है या किया जा रहा है, वह सिर्फ़ ग़लत नहीं, अपराध है. मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का प्रचार अपराध है. नफ़रत के उस प्रचार की इजाज़त देना उस जुर्म में शरीक़ होना है. समाज के हर तबके को सुरक्षा देना, उसका अहसास दिलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है. वह क्यों मुसलमानों की सुरक्षा के लिए ख़ुद को जवाबदेह नहीं मानती?
तरुण की हत्या के बाद दिल्ली में और दिल्ली के बाहर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. सरकार और पुलिस ने कहीं चेतावनी नहीं दी है कि ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. झूठी खबर और दुष्प्रचार के लिए भी किसी पर कार्रवाई नहीं की गई है. मीडिया और सरकार चाहती है कि हिंदुओं के भीतर मुसलमानों के खिलाफ घृणा बढ़े, गहरी हो. उनकी साझेदारी की जगहें कम होती जाएं, ख़त्म हो जाएं. लेकिन हम, विशेषकर वे
हिमंता बिस्वा शर्मा बांग्ला भाषी मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो अभियान चला रहे हैं उसे यह कहकर उचित ठहराते हैं कि यह स्थानीय असमिया मुसलमानों के नहीं मात्र घुसपैठियों के विरुद्ध है. अगर मान भी लें कि ये मुस्लिम ठेठ असमिया नहीं हैं, फिर भी उनके ख़िलाफ़ हिंसा के प्रचार और हिंसा की क्या क़ानून इजाज़त देता है?
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी नियमावली पर रोक लगाई है जो उसी के आदेश के कारण बनाई और घोषित की गई थी. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जिस तरह ‘सवर्ण’ समुदायों का एक हिस्सा भड़क उठा. संख्या में कम होने पर भी इस समुदाय की ताक़त कितनी अधिक है और वह कितना प्रभावी है, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से पता लगता है.
भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है.
अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्वायत्तता की, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करेंगे और सतहीपन का विरोध करेंगे. इस विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है. किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है. जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?
हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.
ईसाइयों के ख़िलाफ़ अभियान पिछले सालों में तेज़ होता चला जा रहा है. भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 2.3% ईसाई हैं. पिछले कई दशकों से भारत की आबादी में उनका हिस्सा लगभग यही रहा है. फिर धर्मांतरण से ईसाइयों की जनसंख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का ख़तरा क्यों सबको वास्तविक जान पड़ता है?
नीतीश कुमार द्वारा की गई असभ्यता के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं कि मुख्यमंत्री को महिला विरोधी नहीं कहा जा सकता और न मुसलमान विरोधी क्योंकि इन दोनों के हित के लिए उन्होंने कई काम किए हैं. तो क्या इसका यह अर्थ समझें कि अगर आपने मेरी कोई मदद की है तो मैं आपको अपने साथ बदतमीज़ी करने का हक़ दे दूं?
अमेरिका में जिस एक पहचान का अपराधीकरण कर दिया गया है, वह है मुसलमान पहचान. उसे पूरी तरह क़बूल करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं. लेकिन ज़ोहरान ममदानी ने यह मुश्किल काम कर दिखाया.
पिछले 11 वर्षों से देश के लगभग हर शिक्षा संस्थान में बौद्धिक गतिविधियों पर प्रशासन का नियंत्रण सख़्त होता जा रहा है. पाठ्यक्रमों के मामले में अब विभाग आज़ाद नहीं हैं. कोई गोष्ठी आयोजित नहीं की जा सकती. मात्र ‘राष्ट्रवादी’ विषयों और वक्ताओं को अब जगह दी जाती है. विश्वविद्यालय बौद्धिक मूर्च्छा में बस सांस ले रहे हैं. उनके जीवित होने का भ्रम है.
पिछले दो दशकों में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में हुई हिंसा में अधिकतर एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं? इस छात्र संगठन को इस सवाल से जूझना चाहिए कि विचार के परिसर में उसने हिंसा को क्यों चुना है?
भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां आने की इजाज़त दी है. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में इन विदेशी विश्वविद्यालयों को यह स्वतंत्रता मिलेगी?