1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.